Central Government ने दवा रसायनों पर निगरानी बढ़ाई, हर खेप को NOC अनिवार्य

By Ankit Jaiswal | Nov 03, 2026

दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले कुछ जरूरी रसायनों की निगरानी सख्त कर दी है। इसके तहत अब इन रसायनों की हर खेप को बाजार में भेजने से पहले डिजिटल पंजीकरण और अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना जरूरी होगा। हालांकि, इस नए नियम को लेकर दवा कंपनियों के बीच कई सवाल भी उठने लगे हैं। खासकर निर्यात के लिए दवाएं बनाने वाली कंपनियां यह जानना चाहती हैं कि क्या उन पर भी यह नियम उसी तरह लागू होगा। उद्योग से जुड़े लोगों को आशंका है कि मंजूरी मिलने में देरी हुई तो दवाओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, दवा उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि जारी निर्देश में घरेलू बाजार और विदेश भेजी जाने वाली दवाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों के बीच कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया गया है। ऐसे में निर्यात के लिए दवाएं बनाने वाली कंपनियां भी इस नियम के दायरे में आ सकती हैं। दिल्ली के एक दवा उद्योग अधिकारी के मुताबिक, सरकार को इस बारे में साफ जानकारी देनी चाहिए, ताकि अलग-अलग राज्यों में नियमों को लेकर अलग-अलग राय न बने। उन्होंने बताया कि खांसी की दवाओं को विदेश भेजने से पहले सरकारी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से गुणवत्ता जांच प्रमाणपत्र लेना भी जरूरी होता है।

टीमलीज रेगटेक के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऋषि अग्रवाल का कहना है कि निर्यात करने वाली कंपनियों के पास भी औषधि एवं प्रसाधन सामग्री कानून के तहत दवा बनाने का लाइसेंस होता है। वे भी उसी आपूर्ति व्यवस्था से रसायन खरीदती हैं, जिससे घरेलू बाजार के लिए दवाएं बनाने वाली कंपनियां खरीदारी करती हैं। उनके मुताबिक, भारत में मरीज के लिए बनने वाली दवा और विदेश भेजी जाने वाली दवा की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। इसलिए कच्चे माल के स्तर पर निगरानी की यह व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है।

हालांकि, इस नई व्यवस्था को लागू करने की क्षमता को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। कई राज्यों के औषधि नियंत्रण विभागों में पहले से कर्मचारियों की कमी है। ऐसे में हर खेप के लिए बड़ी संख्या में प्रमाणपत्र जारी करना चुनौती बन सकता है। ऋषि अग्रवाल के मुताबिक, मंजूरी मिलने में देरी से दवा बनाने वाली छोटी कंपनियों को सबसे ज्यादा परेशानी हो सकती है। उनके पास बड़े कारोबारियों की तुलना में कम भंडार होता है और वे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं पर अधिक निर्भर रहती हैं।

इसका असर ग्रामीण इलाकों में दवाओं की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, भारत में खांसी और जुकाम की दवाओं का बाजार करीब 7,000 करोड़ रुपये का है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में इन दवाओं की मांग काफी रहती है। छोटी कंपनियों को मंजूरी में देरी हुई तो छोटे शहरों और गांवों की दवा दुकानों तक इसका असर पहुंच सकता है। बड़ी कंपनियों के पास ज्यादा भंडार और मजबूत आपूर्ति व्यवस्था होने के कारण वे ऐसी देरी को आसानी से संभाल सकती हैं।

दवा निर्माण क्षेत्र की कंपनी एकम्स ड्रग्स की निदेशक अरुषि जैन ने कहा कि गुणवत्ता से जुड़े नए नियमों के साथ मंजूरी देने की समय सीमा भी तय होनी चाहिए। नियामक विभागों, आपूर्तिकर्ताओं और दवा निर्माताओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है, ताकि दवाओं की उपलब्धता प्रभावित न हो।

गौरतलब है कि यह कदम मध्य प्रदेश में 2025 के दौरान कोल्ड्रिफ खांसी सिरप से 24 बच्चों की मौत के बाद उठाई जा रही सख्त निगरानी का हिस्सा है। जांच में सिरप के भीतर जहरीले रसायन डायएथिलीन ग्लाइकोल की अधिक मात्रा पाई गई थी। यह एक सस्ता औद्योगिक रसायन है, जिसका गलत या गैरकानूनी इस्तेमाल दवाओं में इस्तेमाल होने वाले प्रोपाइलीन ग्लाइकोल की जगह किया जा सकता है।

नई निगरानी व्यवस्था में ग्लिसरीन, प्रोपाइलीन ग्लाइकोल, सोर्बिटोल, माल्टिटोल, पॉलीइथिलीन ग्लाइकोल, पॉलीसॉर्बेट और एथिल अल्कोहल जैसे रसायन शामिल हैं। इनका इस्तेमाल सिरप, गोलियां, कैप्सूल, मलहम और इंजेक्शन सहित कई तरह की दवाएं बनाने में होता है। ऐसे में सरकार के सामने दवाओं की गुणवत्ता पर सख्त नजर रखने के साथ उनकी नियमित आपूर्ति बनाए रखने की भी चुनौती है।

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