By संतोष उत्सुक | Mar 16, 2026
कुछ क्षेत्रों, व्यक्तियों और चीजों की विशेषताएं सभी को पता होती हैं लेकिन कुछ दिन बाद फिर से कोई बता दे तो तरोताज़ा होती रहती हैं। राजनीति क्षेत्र में भी ऐसी परम्परा है। राजनीति ज़िंदगी को हर तरफ फूल सजे मतभेदों का मैदान बनाए रखती है जहां बड़े से लेकर छोटे राजनेता अलग अलग खेल खेलते रहते हैं। विरोधी के खिलाफ ज़बानी तीर चलाते समय मर्यादा तोड़ना ही असली खेल माना जाता है। इन्हीं यशस्वी खिलाड़ियों दवारा रैलियों में आपत्तिजनक वैमनस्य फैलाते अपशब्दों के जलते भूनते मसाले में पकाए नारे लगाना ज़रूरी होता है तभी शारीरिक जोश बना रहता है। दूसरे के पद की गरिमा भूलने से पहले, अपनी गरिमा भूल जानी चाहिए ताकि दूसरे के पद की गरिमा भूल जाना आसान हो जाए और शालीनता भाग जाए। इस सन्दर्भ में भाषाई मर्यादा की दीवार तोडनी पड़ती है। इसका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक फायदा यह है कि समाज पर कई तरह का असर पड़ता है। इसे हम कुअसर या सुअसर नहीं कह सकते क्यूंकि समाज बहुत सभ्य और समझदार होता जा रहा है।
कई बार होता है, टिप्पणी की जाती है जो काफी सख्त किस्म की होती है फिर कहा जाता है कि संवैधानिक पदों पर विराजे नेताओं के बारे बेहतर भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमें शाब्दिक मर्यादा हो। इस बात का भी असर होना ही चाहिए। लेकिन चूंकि उम्दा राजनीति की चारित्रिक विशेषता के अंतर्गत किसी भी रंग और आकार के शब्दों का असर नहीं लेना चाहिए, इसलिए नहीं लिया जाता। वह बात दीगर है कि संवैधानिक पदों पर विराजे नेताओं के मुखमंडल द्वारा, सामान्य नेताओं, विपक्ष या आम आदमी बारे प्रयोग की जाने वाली भाषा बारे कोई नर्म बात तो नहीं की जाती। कहते तो हैं कि इस वजह से सवैंधानिक संस्थाओं का सम्मान हिलने लगता है। कई बार गिर भी जाता है लेकिन अधिकांश नेता तो सम्मान को सामान ही समझते हैं। विरोध के अधिकार को तो वैसे भी सुरक्षित माना जाता है।
उच्च स्तरीय राजनीतिक परिदृश्य में हंगामे, नारेबाज़ी और हुल्लड़ के सहारे कहीं का भी नजारा बदल दिया जाता है। कहीं और का मामला कहीं दूसरी जगह लाया जाता है। दुनिया की बेहद महत्त्वपूर्ण चीज़, ‘माफी’ मांगने के लिए कहा जाता है। ऐसा लगता है माफी न होकर स्वादिष्ट चाट हो जिसके खाने से गुस्सा मानसिक संतुष्टि में बदल जाएगा। इस मनोरंजक गतिरोध के दौरान कई अहम राजनीतिक परेशानियां इक्कठी होकर कॉकटेल पार्टी करती हैं। उन्हें लगता है कहीं उनका समाधान निकाल लिया गया तो ऐसा मौका कम होता जाएगा।
आक्रामकता के झंडे हिलाते हुए पक्ष और विपक्ष दोनों को, बेचारा वक़्त हाथ जोड़कर समझाता रहता है। मगर उसकी कौन सुनता है। राजनेता उससे पूछते हैं, तुम कौन हो जो हमें समझाने की हिमाकत कर रहे हो। बेशर्मी बार बार ठहाका लगाकर हंसती है, जिस तरह सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनाई कमर्शियल फिल्म में नर्तकी, आइटम डांस में फूहड़ तरीके से मुस्कुराकर शरीर प्रदर्शन करती है।
राजनीति का व्यवसाय तो चलता ही रहता है। बीच बीच में गधों और खच्चरों को घोड़ा बनाकर पशु व्यापार भी कर लिया जाता है जिससे दूसरे जानवर भी बहुत खुश रहते हैं। उन्हें लगता है कभी न कभी उनका नंबर भी ज़रूर आएगा। राजनीति के मोहल्ले में आशा ही जीवन होता है।
- संतोष उत्सुक