By अनन्या मिश्रा | Jul 24, 2026
आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी मनाई जाती है। देवशयनी एकादशी को पद्मा, हरिशयनी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से जगत के पालनहार भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर योगनिद्रा में चले जाते हैं। देवशयनी से ही चातुर्मास की शुरूआत होती है। इस दौरान शुभ कार्य वर्जित होते हैं। तो आइए जानते हैं कि साल 2026 में देवशयनी एकादशी कब है और इसका क्या महत्व है। वहीं चातु्र्मास के दौरान किन नियमों का पालन करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक देवशयनी एकादशी पर श्रीहरि विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान चार महीनों तक भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। यही वजह है चातुर्मास के दौरान भगवान शिव और भगवान श्रीहरि की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दौरान जप, तप, दान, व्रत और सत्संग करने से विशेष पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक करीब 4 महीने का समय चातुर्मास कहलाता है। चातुर्मास के चार महीनों में सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह आते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह चार महीने भक्ति, संयम और साधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है।
इस दौरान भगवान श्रीहरि विष्णु और भगवान शिव की नियमित रूप से पूजा करना चाहिए।
एकादशी, प्रदोष और सावन के व्रत रखना चाहिए।
रामचरितमानस, गीता और श्रीमद्भागवत गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना चाहिए।
गरीबों और जरुरतमंद लोगों को वस्त्र, अन्न और दक्षिणा का दान करना चाहिए।
सात्विक भोजन करना चाहिए और अपने मन को शांत रखने का प्रयास करें।
इस दौरान दीपदान और तुलसी पूजा करना शुभ माना जाता है।
इस दौरान शुभ कार्य जैसे गृहप्रवेश, मुंडन और विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए।
तामसिक भोजन, मांस और शराब आदि से दूर रहना चाहिए।
झूठ, क्रोध और दूसरों की निंदा करने से बचना चाहिए।
धार्मिक मान्यता है कि जब भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के मुहूर्त नहीं निकाले जाते हैं। इसलिए चातुर्मास के दौरान ज्यादातर शुभ कार्य स्थगित रहते हैं। देवउठनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं, तो फिर से विवाह और अन्य मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।
सुबह जल्दी स्नान आदि के बाद लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर इस पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा का स्थापित करें। उनको तुलसी दल, पीले फूल, पंचामृत और भोग आदि अर्पित करें। इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम या 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:' मंत्र का जाप करें। फिर दीपक जलाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की आरती करें और व्रत रखें। अगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करें।