By अनन्या मिश्रा | Jul 23, 2026
हिंदू धर्म में व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व होता है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में देवशयनी एकादशी मनाई जाएगी। इसको हरिशयनी और आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जानते हैं। इस देवशयनी एकादशी से चार महीनों के लिए भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में होने की वजह से देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरूआत होती है। इस दौरान शुभ कार्यों जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। वहीं इस चातुर्मास के दौरान साधु-संत भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण नहीं करते हैं। तो आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी कब है और चातुर्मास का क्या महत्व होता है।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी क्षीर सागर में 4 महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। इस चार महीनों में भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। भगवान शिव की आराधना के लिए पूरे महीने तक सावन पर विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजा-पाठ, दान, जप-तप और व्रत करने पर पुण्यफल की प्राप्ति होती है।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक देवशयनी एकादशी से शुरू होकर देवउठनी एकादशी तक श्रीहरि योगनिद्रा में रहते हैं। इस चार महीने के समय को चातुर्मास कहा जाता है। चातुर्मास के दौरान सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक महीने आते हैं। शास्त्रों में इन 4 महीनों का विशेष महत्व होता है। जिसमें भक्ति और साधना का विशेष महत्व होता है।
हिंदू धर्म में चातुर्मास के दौरान श्रीहरि के चार महीने योगनिद्रा और साधना के लिए बेहद अहम होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शुभ और मांगलिक कार्यों में श्रीहरि की उपस्थिति रहती है। जिसमें पूजा और दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों में आशीर्वाद देते हैं। लेकिन श्रीहरि के योगनिद्रा में रहने से किसी भी तरह के शुभ कार्यों में उनका आशीर्वाद नहीं मिल पाता है। जिस कारण चातुर्मास में शुभ कार्यों को स्थगित कर दिया जाता है। देवउठनी एकादशी पर श्रीहरि के जागने पर शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।