By Ankit Jaiswal | Aug 05, 2026
भारत की महिला शतरंज टीम एक बार फिर शतरंज ओलंपियाड में स्वर्ण पदक जीतने के इरादे से उतरने जा रही है। इस बार टीम के चयन में सबसे ज्यादा चर्चा एक बड़े बदलाव को लेकर हो रही है। पिछली बार स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम की अनुभवी खिलाड़ी हरिका द्रोणावल्ली इस बार भारतीय टीम का हिस्सा नहीं होंगी। उनकी जगह चेन्नई की 19 वर्षीय युवा खिलाड़ी सविता श्री को मौका मिला है, जिन्होंने अपने खेल और संघर्ष से यह स्थान हासिल किया है।
बता दें कि हरिका द्रोणावल्ली ने इस बार स्वयं प्रतियोगिता से दूर रहने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि टीम प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने का सपना पूरा हो चुका है और अब वह अपना पूरा ध्यान व्यक्तिगत प्रतियोगिताओं पर केंद्रित करना चाहती हैं। ऐसे में चयनकर्ताओं ने उनकी जगह सविता श्री को टीम में शामिल किया है।
गौरतलब है कि सविता श्री इससे पहले 2022 के एशियाई खेलों में भी भारत की महिला टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। उस प्रतियोगिता में भारत ने रजत पदक जीता था। उस टीम में कोनेरू हम्पी, हरिका द्रोणावल्ली, आर. वैषाली और वंतिका अग्रवाल भी शामिल थीं। अब सविता को पहली बार शतरंज ओलंपियाड में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है।
सविता की सफलता के पीछे उनके परिवार का लंबा संघर्ष छिपा है। उनके पिता भास्कर ने बताया कि सबसे पहले उनके बड़े बेटे मुगेश ने शतरंज खेलना शुरू किया था। सविता अपने भाई को खेलते हुए देखती थीं और धीरे-धीरे उनकी भी इस खेल में रुचि बढ़ गई। छह वर्ष की उम्र में दोनों भाई-बहन ने भारत के प्रसिद्ध प्रशिक्षक आर. बी. रमेश और उनकी पत्नी आरती रामास्वामी से प्रशिक्षण लेना शुरू किया।
हालांकि परिवार की आर्थिक स्थिति दोनों बच्चों के खेल का खर्च उठाने की अनुमति नहीं देती थी। ऐसे में भास्कर ने कठिन फैसला लेते हुए केवल सविता के खेल पर पूरा ध्यान देने का निर्णय लिया। इसके बाद मुगेश ने आठवीं कक्षा के बाद प्रतियोगी शतरंज छोड़ दिया और आगे की पढ़ाई पूरी कर नौकरी करने लगे।
बता दें कि सविता के करियर को आगे बढ़ाने के लिए उनके पिता ने सिंगापुर में बिजली मिस्त्री की अपनी नौकरी भी छोड़ दी। वह भारत लौट आए ताकि बेटी के साथ प्रतियोगिताओं में जा सकें और उसके प्रशिक्षण का ध्यान रख सकें। लेकिन इसके बाद परिवार को गंभीर आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब राष्ट्रीय प्रतियोगिता की प्रवेश फीस भरने के लिए उन्हें अपने सोने के आभूषण गिरवी रखने पड़े।
गौरतलब है कि वर्ष 2022-23 में सविता विश्व त्वरित शतरंज चैंपियनशिप के लिए कजाखस्तान जाने के लिए चुनी गईं, लेकिन यात्रा का खर्च जुटाना परिवार के लिए संभव नहीं था। उस समय उनके विद्यालय वेलम्मल ने आर्थिक सहायता दी। सविता ने इस भरोसे को सही साबित करते हुए कांस्य पदक जीता और प्रतियोगिता में पदक जीतने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बनीं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, कुछ समय तक उन्हें निजी प्रायोजकों का सहयोग भी मिला, लेकिन बाद में यह सहायता बंद हो गई। इससे प्रतियोगिताओं में भाग लेना कठिन हो गया। इसी वर्ष अप्रैल में तमिलनाडु सरकार की आर्थिक सहायता योजना के तहत उन्हें सहयोग मिलना शुरू हुआ, जिससे अब उनका खेल आगे बढ़ रहा है।
भास्कर का कहना है कि उनका सपना है कि सविता दुनिया की शीर्ष पेशेवर शतरंज खिलाड़ियों में शामिल हों। परिवार ने वर्षों तक संघर्ष और त्याग किया है और अब उनकी उम्मीद है कि समरकंद में होने वाले शतरंज ओलंपियाड में सविता श्री भारत के लिए शानदार प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन करेंगी।