By नीरज कुमार दुबे | Apr 13, 2026
एक ओर चीन भारत के साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाने की बात करता है, शांति और स्थिरता की दुहाई देता है, तो दूसरी ओर अपनी पुरानी फितरत से बाज न आते हुए एक बार फिर पीठ में छुरा घोंप रहा है। हम आपको बता दें कि शिनजियांग में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान की सीमा के पास नया काउंटी सेनलिंग बनाकर बीजिंग ने साफ कर दिया है कि उसकी नीयत बातचीत नहीं बल्कि दबदबा कायम करने की है। इतना ही नहीं, अरुणाचल प्रदेश में भारतीय क्षेत्रों के नाम बदलने की दुस्साहसी हरकत करके चीन ने यह भी दिखा दिया है कि वह केवल जमीन पर ही नहीं बल्कि नक्शे और सोच दोनों पर कब्जा करना चाहता है। यह सिर्फ कूटनीतिक चाल नहीं, बल्कि भारत को चारों तरफ से घेरने की खुली रणनीति है।
हियन काउंटी में अक्साई चिन का बड़ा हिस्सा शामिल है, जो 1962 के युद्ध के बाद से चीन के कब्जे में है। यह वही इलाका है जो भारत चीन विवाद की जड़ है। अब सेनलिंग काउंटी बनाकर चीन इस पूरे क्षेत्र को प्रशासनिक रूप से स्थायी रूप देने की कोशिश कर रहा है। इसका मतलब साफ है कि चीन धीरे-धीरे जमीन पर अपनी स्थिति को मजबूत करके भविष्य की बातचीत में बढ़त बनाना चाहता है।
काशगर की भूमिका यहां बेहद अहम है। यह शहर प्राचीन सिल्क रोड का केंद्र रहा है और आज चीन को दक्षिण एशिया और मध्य एशिया से जोड़ने का मुख्य द्वार है। यही से चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा शुरू होता है, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुजरता है। भारत इस परियोजना का लगातार विरोध करता रहा है, लेकिन चीन इसे अपनी रणनीतिक रीढ़ बना चुका है।
चीन के इस कदम के पीछे सुरक्षा का भी एक तर्क दिया जा रहा है। हम आपको बता दें कि वाखान कॉरिडोर, जो अफगानिस्तान का एक संकरा इलाका है, चीन के लिए चिंता का विषय रहा है। बीजिंग को डर है कि उइगर उग्रवादी इस रास्ते से शिनजियांग में घुस सकते हैं। इसी वजह से सेनलिंग काउंटी बनाकर चीन इस क्षेत्र में निगरानी और नियंत्रण बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि चीन इस इलाके को सैन्य और राजनीतिक रूप से पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेना चाहता है।
अब बात करते हैं चीन के दूसरे मोर्चे की, जो और भी खतरनाक है। बीजिंग ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश के 23 स्थानों के नाम बदल दिए हैं। पिछले दस साल में यह छठी बार है जब चीन ने ऐसा किया है। भारत ने इस पर कड़ा जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय ने दो टूक शब्दों में कहा है कि नाम बदलने से हकीकत नहीं बदलती और अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट कहा कि चीन की ऐसी हरकतें केवल झूठी कहानी गढ़ने की कोशिश हैं और इनसे जमीन की सच्चाई नहीं बदलेगी। भारत ने यह भी कहा कि ऐसे कदम दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की कोशिशों को नुकसान पहुंचाते हैं और चीन को ऐसी गतिविधियों से बचना चाहिए।
हम आपको बता दें कि चीन अरुणाचल प्रदेश को जांगनान यानी दक्षिण तिब्बत बताता है और पूरे राज्य पर दावा करता है। तवांग को लेकर उसका दावा और भी आक्रामक है। वह तिब्बती बौद्ध धर्म के दूसरे सबसे बड़े मठ और छठे दलाई लामा के जन्मस्थान का हवाला देकर अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश करता है। लेकिन भारत के लिए यह केवल ऐतिहासिक या धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि संप्रभुता का सवाल है।
अब अगर इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट हो जाती है। एक तरफ चीन जमीन पर नए काउंटी बनाकर अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत कर रहा है, दूसरी तरफ वह नाम बदलकर अपने दावों को वैध दिखाने की कोशिश कर रहा है। यह दोहरी रणनीति भारत को चारों तरफ से घेरने का प्रयास है।
भारत पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। एक तो इससे सीमा पर तनाव और बढ़ सकता है, खासकर लद्दाख और अरुणाचल में। साथ ही चीन भविष्य में इन इलाकों को लेकर और आक्रामक रुख अपना सकता है। इसके अलावा, पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती साझेदारी भारत के लिए दोहरी चुनौती बन सकती है, क्योंकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में उसकी मौजूदगी पहले से ही मजबूत है।
रणनीतिक तौर पर यह संकेत है कि चीन अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं कर रहा बल्कि उन्हें विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत को अब केवल विरोध दर्ज कराने से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। सीमा पर बुनियादी ढांचे को और मजबूत करना, सैन्य तैयारियों को और तेजी से बढ़ाना तथा कूटनीतिक स्तर पर चीन को घेरना समय की मांग है।
बहरहाल, यह साफ है कि चीन की यह चालें अचानक नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति का हिस्सा हैं। सेनलिंग काउंटी और अरुणाचल में नाम बदलने की कवायद उसी बड़ी योजना के हिस्से हैं, जिसका मकसद है क्षेत्रीय वर्चस्व स्थापित करना। भारत के लिए यह चेतावनी है कि आने वाला समय और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।