अफगानिस्तान से US की वापसी, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा के लिए चीन ऐसे बना तालिबान का विश्वसनीय दोस्त

By अभिनय आकाश | Mar 07, 2022

अमेरिका को अफगानिस्तान से क्यों हटना पड़ा? क्या इस क्षेत्र के लिए चीन की महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं? इन भू-राजनीतिक घटनाओं का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? एक नई किताब, द कॉमरेड्स एंड द मुल्ला: चाइना, अफगानिस्तान एंड द न्यू एशियन जियोपॉलिटिक्स में द हिंदू के दो पत्रकारों ने चीन-अफगानिस्तान संबंधों की कहानी और चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए अमेरिकी वापसी का अर्थ बताया है। 

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अमेरिका अफगानिस्तान से जल्दबाजी में वापसी की ओर बढ़ रहा था। उस बैठक से तीन हफ्ते बाद अमेरिकी सेना ने , अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य शक्ति के प्रतीक बगराम हवाई क्षेत्र को रातो रात ही छोड़ दिया और अफगान कमांडर को सूचित नहीं किया था कि वे थे जा रहे है। राजनीतिक सुलह पर बातचीत ठप हो गई थी। प्रांतों में शहर के बाद शहर तालिबान के अधीन हो रहा था। 

तालिबान का विश्वसनीय दोस्त चीन

प्रवाह की इस खतरनाक स्थिति के बीच चीन एक ऐसा बयान दे रहा था जिसको लेकर चर्चा दुनिया भर में हो रही थी। ये संदेश सरल था। चीन ने तालिबान को अफगानिस्तान के भविष्य में एक वैध हितधारक के रूप में देखा और जब वह सत्ता में आया, तो बीजिंग उसकी पीठ थपथपाएगा। वांग ने बरादर को कहा कि अफगानिस्तान के सबसे बड़े पड़ोसी के रूप में चीन ने हमेशा अफगानिस्तान की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया है। अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप का पालन किया है और पूरे अफगान लोगों के प्रति एक दोस्ताना नीति अपनाई है। तालिबान को समर्थन वाला चीनी बायन बीजिंग से स्पष्ट उम्मीदों के साथ आया था। वांग ने कहा कि चीन को उम्मीद है कि तालिबान 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' सहित सभी आतंकवादी संगठनों से पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। बरादर ने भी वांग के इस बयान को हाथों हाथ लेते हुए कहा कि चीन 'हमेशा अफगान लोगों का एक विश्वसनीय दोस्त रहा है' और तालिबान की प्रतिबद्धता को व्यक्त करते हुए 'किसी भी बल को चीन के लिए हानिकारक कृत्यों में शामिल होने के लिए कभी भी अफगान क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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धीरे-धीरे तालिबान के साथ संबंध स्थापित किए

लेकिन ये कोई ऐसा नहीं हुआ था कि अचानक ही तालिबान और चीन की दोस्ती परवान चढ़ने लगी। चीन ने वर्षों में धीरे-धीरे तालिबान के साथ संबंध बनाए। अपने पहले शासन के दौरान तालिबान ने बीजिंग से जो संपर्क स्थापित किए थे, उसे बंद कर दिया। जिसे 2014 के बाद की अवधि में बढ़ा दिया गया था। ये संबंध पश्चिमी निकास रणनीति और शी जिनपिंग की नई पड़ोसी कूटनीति के साथ मेल खाता था। 2015 में चीन ने उरुमकी में तालिबान प्रतिनिधियों और अफगान सरकार के बीच गुप्त वार्ता की मेजबानी की, जिसमें पाकिस्तान बिचौलिए के रूप में मौजूद था। जबकि अगले वर्ष मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई के नेतृत्व में एक तालिबान प्रतिनिधिमंडल ने बीजिंग का दौरा किया। 

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