Prabhasakshi NewsRoom: Arunachal में G20 की बैठक होने से खफा China ने फिर चल दी पुरानी चाल

By नीरज कुमार दुबे | Apr 04, 2023

चीन कहता कुछ है और करता कुछ है। इसकी एक ताजा मिसाल तब सामने आई जब वह अरुणाचल प्रदेश में आयोजित जी-20 की एक बैठक में शामिल नहीं हुआ। चीन चूंकि अरुणाचल प्रदेश को अपना मानता है इसलिए वह वहां भारत की ओर से आयोजित जी-20 देशों के प्रतिनिधियों की एक बैठक में शामिल नहीं हुआ और सांकेतिक तौर पर अपना विरोध जताया। वहीं दूसरी ओर एससीओ बैठक में चीन ने आतंकवाद के खिलाफ अभियान और तमाम क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग बढ़ाने को लेकर तमाम बड़े-बड़े प्रवचन दिये। लेकिन अब चीन ने जो कदम उठाया है वह दर्शाता है कि उसके मन में सहयोग की नहीं सिर्फ विरोध की भावना है। हम आपको बता दें कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे पर फिर से जोर देने के मकसद से इस भारतीय राज्य के लिए ‘‘चीनी, तिब्बती और पिनयिन’’ अक्षरों में नामों की तीसरी सूची जारी की है। लेकिन चीन को यहां समझना होगा कि किसी भारतीय राज्य को अपना मान लेने और उस क्षेत्र के लिए अपनी भाषा में नाम रख देने से ही कोई क्षेत्र उसका नहीं हो जायेगा। विस्तारवादी चीन को समझना होगा कि यदि ऐसे नाम रख देने से कोई क्षेत्र किसी का हो जाता है तो हम बीजिंग का नाम बदल कर बजरंग पुर रख देते हैं। चीन को यह भी समझना होगा कि अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय लोग क्या चाहते हैं? अरुणाचल प्रदेश के लोग भारत के साथ थे, भारत के साथ हैं और भारत के साथ रहेंगे। चीन ने तिब्बत पर भले कब्जा कर लिया है लेकिन अरुणाचल प्रदेश के बारे में वह जो ख्वाब पाले हुए है वह कभी पूरे नहीं हो पायेंगे। चीन को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हाल ही में तवांग में उसके सैनिकों को भारतीय सेना ने कैसे पीट कर वापस भेजा था।

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हम आपको यह भी बता दें कि ‘ग्लोबल टाइम्स’ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स डेली समूह के प्रकाशनों का हिस्सा है। इसने चीनी विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि नामों की घोषणा एक वैध कदम है और भौगोलिक नामों को मानकीकृत करना चीन का संप्रभु अधिकार है। उल्लेखनीय है कि तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के बाद 2017 में चीन द्वारा नामों की पहली सूची की घोषणा की गई थी। उस समय चीन ने उनकी यात्रा की काफी आलोचना की थी। हम आपको याद दिला दें कि दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश के तवांग के रास्ते तिब्बत से भाग आए थे और उन्होंने 1950 में तिब्बत पर चीन के सैन्य नियंत्रण के बाद 1959 में भारत में शरण ली थी।

बहरहाल, चीन ने अरुणाचल प्रदेश में छह स्थानों के मानकीकृत नामों की पहली सूची 2017 में जारी की थी और 15 स्थानों की दूसरी सूची 2021 में जारी की गई थी। चीनी मंत्रालय द्वारा अरुणाचल प्रदेश के लिए अब जारी की गयी मानकीकृत भौगोलिक नामों की यह तीसरी सूची है। हम आपको यह भी बता दें कि भारत पूर्व में अरुणाचल प्रदेश में कुछ स्थानों के नाम बदलने के चीनी कदम को खारिज कर चुका है और भारत यह कहता रहा है कि अरुणाचल प्रदेश ‘‘सदैव’’ भारत का अभिन्न अंग रहा है तथा ‘‘हमेशा’’ रहेगा और "गढ़े गए" नामों से यह तथ्य नहीं बदलता।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने दिसंबर 2021 में कहा था, "यह पहली बार नहीं है, जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश में इस तरह से स्थानों का नाम बदलने का प्रयास किया है।" उन्होंने कहा था, "अरुणाचल प्रदेश हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है और सदा रहेगा। अरुणाचल प्रदेश में स्थानों को गढ़े गए नाम देने से यह तथ्य नहीं बदल जाता।" 

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