Prabhasakshi NewsRoom: Border पर तनाव के बीच Modi सरकार ने 4 Chinese Companies को दी छूट, Congress ने उठाये सवाल

By नीरज कुमार दुबे | Jul 04, 2026

मोदी सरकार ने देश में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने वाली चार चीनी विद्युत उपकरण कंपनियों को महत्वपूर्ण विद्युत परियोजनाओं की सरकारी निविदाओं में भाग लेने की अनुमति देकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। वित्त मंत्रालय के 24 जून के आदेश के तहत टीबीइए एनर्जी, नानजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया और ताइकाई इलेक्ट्रिक इंडिया को दो वर्षों के लिए विशेष छूट दी गई है। सरकार का कहना है कि तेजी से बढ़ती बिजली मांग और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को गति देने के लिए यह फैसला जरूरी है, लेकिन कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन नीति से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि सीमा विवाद और सुरक्षा चिंताओं के बावजूद सरकार चीन को लेकर नरम रुख अपना रही है।

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मोदी सरकार का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के तेजी से विकास के कारण सरकार विद्युत प्रसारण नेटवर्क को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है। माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में उपकरणों और तकनीकी क्षमता की आवश्यकता को देखते हुए इन कंपनियों को सीमित राहत दी गई है ताकि परियोजनाओं की गति प्रभावित न हो।

हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। कांग्रेस ने सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की है। पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार चीन के प्रति चरणबद्ध तरीके से झुकाव दिखा रही है। उन्होंने कहा कि यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का भी उल्लेख किया।

जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच पर जारी अपने वक्तव्य में कहा कि अरुणाचल प्रदेश, ब्रह्मपुत्र नदी और पूर्वी लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर चीन का रवैया अब भी नहीं बदला है। उन्होंने वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प का उल्लेख करते हुए सरकार की चीन नीति पर सवाल उठाए। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे निर्णयों में अधिक सतर्कता बरती जानी चाहिए।

हम आपको याद दिला दें कि वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद भारत सरकार ने चीनी कंपनियों पर कई तरह की सख्त शर्तें लागू की थीं। इसके तहत किसी भी सरकारी खरीद प्रक्रिया में शामिल होने से पहले चीनी बोलीदाताओं को सरकारी पंजीकरण, राजनीतिक मंजूरी और सुरक्षा स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया था। इन नियमों का उद्देश्य संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा जोखिमों को कम करना था।

हालांकि बाद में केंद्र सरकार ने इस साल मई महीने में में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नियमों में भी सीमित ढील दी थी, जिसे भी इस फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार ने एक मई 2026 से उन विदेशी कंपनियों को स्वचालित मार्ग के तहत भारत में निवेश की अनुमति दी, जिनमें चीन या हांगकांग की हिस्सेदारी दस प्रतिशत तक है और जिनका नियंत्रण चीनी पक्ष के हाथ में नहीं है। मोदी सरकार का तर्क है कि भारत को अवसंरचना, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में भारी निवेश की जरूरत है, इसलिए निवेश प्रवाह को आसान बनाना आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए जरूरी है। इसके साथ ही सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की सीमावर्ती सात देशों की कंपनियों पर लागू सख्त नियम पूरी तरह समाप्त नहीं किए गए हैं और संवेदनशील मामलों में सरकारी मंजूरी अब भी अनिवार्य रहेगी।

हम आपको याद दिला दें कि गलवान घाटी संघर्ष के बाद वर्ष 2020 में लागू प्रेस नोट तीन के तहत चीन सहित भारत से सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों के लिए निवेश नियम कड़े कर दिए गए थे। इसके अनुसार ऐसे देशों से आने वाले किसी भी निवेश को सरकारी मंजूरी की आवश्यकता होती थी। सरकार का कहना है कि बाद में यह महसूस किया गया कि अल्प हिस्सेदारी रखने वाले वैश्विक निवेशकों और विदेशी कोषों पर भी इन नियमों का असर पड़ रहा था, जिससे निवेश प्रस्तावों में देरी हो रही थी। इसी कारण मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सीमित राहत देने का फैसला किया। हालांकि विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार आर्थिक जरूरतों के नाम पर चीन को लेकर अपने पुराने सख्त रुख से पीछे हट रही है, जबकि सरकार इसे केवल निवेश और औद्योगिक विकास से जुड़ा व्यावहारिक कदम बता रही है।

हम आपको यह भी बता दें कि हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच कूटनीतिक स्तर पर बातचीत भी जारी रही है। पिछले महीने बीजिंग में भारत चीन सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय कार्य प्रणाली की पैंतीसवीं बैठक आयोजित हुई थी। इस बैठक में दोनों देशों के अधिकारियों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति की समीक्षा की और सीमा क्षेत्रों में शांति तथा स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों पर संतोष व्यक्त किया।

बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार का यह निर्णय आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है। एक ओर देश को तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और अवसंरचना परियोजनाओं के लिए उपकरणों की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ सुरक्षा और सीमा संबंधी संवेदनशीलताएं भी बनी हुई हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस संतुलन को किस प्रकार बनाए रखती है और क्या इस फैसले का असर भारत चीन संबंधों तथा घरेलू राजनीति पर पड़ता है।

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