विभाजन के तुरंत बाद जो काम नेहरू को करना चाहिए था वो अब मोदी ने किया

By प्रवीण गुगनानी | Dec 12, 2019

तो अंततः देश विभाजन के तुरंत बाद किया जाने वाला बहु-प्रतीक्षित व प्राकृतिक न्याय वाला कार्य अब पूर्ण हुआ और संसद ने नागरिकता संशोधन बिल पारित कर दिया। चाणक्य ने कहा था कि ऋण, शत्रु और रोग को समय रहते ही समाप्त कर देना चाहिए। जब तक शरीर स्वस्थ और आपके नियंत्रण में है, उस समय आत्म-साक्षात्कार के लिए उपाय अवश्य ही कर लेना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के पश्चात कोई कुछ भी नहीं कर सकता। चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु और विश्व के नीतिशास्त्र व अर्थशास्त्र के प्रणेता कौटिल्य को यदि आज के संदर्भों मे पढ़ें तो राज्य का रोग तुष्टिकरण की राजनीति ही होता है। यदि राजनीति सही चली होती या रोगपूर्ण न होती तो धर्म के आधार पर भारत का विभाजन न हुआ होता और आज नरेंद्र मोदी सरकार को नागरिकता संशोधन बिल लाने की आवश्यकता न पड़ती। देश विभाजन के समय से लेकर आज तक हिंदुओं के साथ हो रहे सामाजिक, राजनैतिक अत्याचारों को रेखांकित करते हुये अमित शाह ने इस विधेयक के पारित होने के दौरान लोकसभा में कहा कि 1947 में पाकिस्तान में 23 फीसदी हिंदू थे लेकिन वहीं साल 2011 में ये आंकड़ा 1.4 प्रतिशत रह गया है। पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को देखते हुए भारत मूकदर्शक नहीं बना रह सकता। जहां इन पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों की संख्या चिंतनीय स्तर पर कम हुई है वहीं, भारत में मुस्लिम आबादी के प्रतिशत में असामान्य बढ़ोतरी हुई है।

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यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान पाकिस्तान में उस समय की अधिकांश संपत्तियों, व्यवसाय व संसाधनों पर हिंदुओं का ही स्वामित्व होता था वहीं मुस्लिमों की स्थिति निर्धनता की थी, अतः इस दृष्टि से भी विभाजन हिंदुओं हेतु के लिए अति पीड़ादायक व हानिकारक रहा, वहीं मुस्लिमों को कई बनी बनाई संपत्तियां, व्यवसाय आदि कब्जा करने को मिल गए थे। सर्वविदित व अकाट्य तथ्य है कि स्वतंत्रता के बाद जो हिंदू पाकिस्तान या बांग्लादेश में बच गए थे वे प्रताड़ित होते रहे व उनके संसाधन छीने गए, जबकि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय की स्थिति व संख्या सुदृढ़ होती गई। वस्तुतः नागरिकता संशोधन विधेयक विलंब से लाया गया विधिक मार्ग है जिससे विभाजन के समय के दीन-हीन हिंदुओं व अन्य समुदायों को पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान के नारकीय जीवन से बाहर निकलने का सम्मानपूर्ण मार्ग निकल सकेगा। विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ था व तब बड़ी संख्या में इस आधार पर ही जनसंख्या की अदला बदली भी हुई थी किंतु बड़ी संख्या में मुस्लिम भारत में छूट गए थे जो सम्मानपूर्वक नागरिक जीवन जीते रहे व असामान्य जनसंख्या वृद्धि करते रहे जबकि पाकिस्तान में छूटे हुये 23% हिंदू पाशविक अत्याचारों व बलपूर्वक धर्मांतरण का शिकार हुये व आज 1.4% की दयनीय दशा में आ गए हैं। आज मोदी सरकार कैब के माध्यम से जो कर रही है वह कार्य स्वतंत्रता के तुरंत बाद नेहरू सरकार को करना चाहिए था। नेहरू सरकार ने इसके विपरीत कार्य किया, उन्होंने पाकिस्तान में छूटे हुये हिंदुओं को अनाथ समझकर अनदेखा किया और भारत में छूट गए मुस्लिमों को तुष्टिकरण की राजनीति के माध्यम से अपना वोट बैंक बनाया व उन्हें अपने सर माथे बैठाते रहे।

हो यह रहा था कि पाकिस्तान में मुस्लिमों के अत्याचारों से तंग होकर जो हिंदू बंधु भारत को अपनी भूमि समझकर यहां आकर रह रहे थे उन्हें अवैध माना जा रहा था व उन्हें नागरिक नहीं माना जा रहा था। हिंदू अपनी ही जन्मभूमि में पराया व अपमानित जीवन जीने को अभिशप्त था। इस अधिनियम के माध्यम से यह स्थिति समाप्त होगी। अब इस प्रकार के उपेक्षित हिंदू बंधुओं को भारत में सम्मान पूर्ण जीवन मिलेगा। नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान में अत्याचारों से तंग होकर बिना किसी दस्तावेज़ के भारत में प्रवेश कर चुके हिंदू अवैध अप्रवासी माने जाते थे। अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है या फिर विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम, 1920 के तहत वापस उनके देश भेजा जा सकता है। मोदी सरकार ने इस संवेदनशील विषय में अपने पहले कार्यकाल में कार्य प्रारंभ कर दिया था और 2015 और 2016 में उपरोक्त 1946 और 1920 के कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई को छूट दे दी थी। इसका मतलब यह हुआ कि इन धर्मों से संबंध रखने वाले लोग अगर भारत में वैध दस्तावेजों के बगैर भी रहते हैं तो उनको न तो जेल में डाला जा सकता है और न उनको निर्वासित किया जा सकता है। यह छूट उपरोक्त धार्मिक समूह के उन लोगों को प्राप्त है जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत पहुंचे हैं। इन्हीं धार्मिक समूहों से संबंध रखने वाले लोगों को भारत की नागरिकता का पात्र बनाने के लिए नागरिकता कानून-1955 में संशोधन के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 संसद में पेश किया गया था किंतु तब यह लोकसभा में पारित होकर राज्यसभा में विफल हो गया था व हिंदू चिंता का एक प्रमुख विषय कुत्सित व तुष्टिकरण राजनीति की भेंट चढ़ गया था।

-प्रवीण गुगनानी

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