अमेरिका-ईरान युद्ध से अब इंटरनेट सेवाओं पर संकट के बादल

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Mar 23, 2026

अमेरिका-इजरायल व ईरान युद्ध के चलते अभी विश्व के देश ऊर्जा संकट का समाधान तो निकाल ही नहीं पा रहे कि डिजिटल सेवाओं के बाधित होने के भय से दुनिया के देशों की सरकारों की जान सांसत में आने लगी हैं। इंटरनेट आज प्रमुख आवश्यकताओं में से एक हो गया है। एयर लाइंस, बैंकिंग सेवाएं, संचार व्यवस्था जिसमें संवाद कायम करने से लेकर सभी तरह की डिजिटल सेवाएं, स्टॉक मार्केट आदि आदि बुरी तरह से प्रभावित होने की संभावनाओं से नकारा नहीं जा सकता। आज इंटरनेट पर निर्भरता बहुत अधिक हो गई है। अमेरिका-ईरान युद्ध को जिस तरह से शुरुआती दौर में ट्रंप द्वारा हलके में लिया जा रहा था वास्तव यह ट्रंप की गलत फहमी ही रही। वैसे भी रुस यूक्रेन के युद्ध से ही अमेरिका को सबक लेना चाहिए था। दोनों देश पास पास होने और संसाधनों की दृष्टि से रुस अधिक ताकतवर होने के बावजूद आज तक कोई अंत नहीं दिखाई दे रहा। अमेरिका ईरान युद्ध के साइड इफेक्ट के रुप में अभी तो उर्जा संकट है पर जिस तरह के हालात बनते जा रहे हैं आने वाले समय में मध्य पूर्व के देशों में पेयजल और दुनिया के देशों के लिए इंटरनेट सेवाओं के प्रभावित होने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। दरअसल जिस तरह से कच्चे तेल और एलपीजी आदि की दुनिया के देशों में सप्लाई हार्मुज जलडमरुमध्य के रास्ते होने और ईरान द्वारा इस रास्ते में अवरोध बनने से उर्जा संकट गंभीर रुप लेता जा रहा हैं। ठीक यही समस्या इंटरनेट को लेकर हो सकती है। कारण साफ है। युद्ध समाप्ति या यों कहें कि सीज फायर के आसार अभी तक बनते नहीं लग रहे तो दूसरी और ज्यों ज्यों एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने के अधिक प्रयास होंगे तो ईरान हथियार के रुप में समुद्र में बिछी केबल्स को भी नुकसान पहुंचाने में कोई गुरेज नहीं करेगा। दुनिया के इंटरनेट ट्रैफिक का प्रमुख रास्ता भी यही है। एक मोटे अनुमान के अनुसार 20 प्रतिशत ट्रैफिक हार्मुज और लालसागर के रास्ते से गुजरता है। हार्मुज जलडमरुमध्य तो हालात यहां तक है कि सकरे स्थान पर तो मात्र 200 फीट की गहराई पर ही सबमैरिन केबल लाईने बिछी हुई है। लगभग यही हालात लालसागर के हैं। वहां भी इंटरनेट सेवाओं के लिए सबमैरिन केबल्स बिछी हुई है। ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि ईरान द्वारा हार्मुज जलडमरुमध्य क्षेत्र में सुरंगे बिछाने का काम किया जा रहा है और इससे अन्य नुकसान होने के साथ ही फाइबर केबल्स के भी क्षतिग्रस्त होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। अधिकांश प्रमुख सेवा प्रदाताओं ने इसी क्षेत्र में डेटा सेंटर स्थापित कर रखे हैं। जानकारों के अनुसार हार्मुज क्षेत्र से करीब 20 और लालसागर क्षेत्र से 17 केबल्स गुजरती है। 2024 में भी लाल सागर क्षेत्र में हूती हमलों के दौरान केबल प्रभावित हो चुकी है। वर्तमान हालातों में यदि सबमैरिन केबल्स प्रभावित भी होती है तो हालात जिस तरह के हैं उनमें प्रभावित केबल्स को ठीक करनों में महीनों ही क्या साल भी लग सकता है और ऐसे में दुनिया के देश एक नए संकट के दौर से गुजरने को मजबूर हो जाएंगे।

वैसे आज संयुक्त राष्ट्र संघ तो बेमानी हो गया है। दुनिया के देशों के अलग अलग बने संगठन चाहे वे नाटो हो या ब्रिक्स या पिछले कुछ सालों के देश-दुनिया के हालातों में बेमानी हो गए हैं। वैश्विक हालात दिन प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कोई ना कोई ऐसी नियामक संस्था या कोई ना कोई इस तरह की बाध्यकारी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए जिससे दुनिया के देशों और उनके नागरिकों से जुड़ी सुविधाओं से छेड़छाड़ ना हो इस तरह की व्यवस्था किया जाना आवश्यक है। किसी भी देश या संगठन को इस तरह की सार्वभौमिक सेवाओं को बाधित करने से रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। क्योंकि दुनिया के देशों में कौन कब सिरफिरा नेता अपने अहम् की शांति के लिए दुनिया को संकट में ड़ाल दे इसकी संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। आज ऊर्जा, पानी, स्वास्थ्य, डिजिटल दुनिया आदि आदि ऐसी सेवाएं है जिनके प्रभावित होने का असर समूची नहीं तो अधिकांश देशों पर पड़ता है और यह दुष्प्रभाव केवल देशों तक ही नहीं अपितु वहां निवास करने वाले करोड़ों नागरिकों पर सीधे सीधे पड़ता है। ऐसे में पूरी वैश्विक व्यवस्था को ही ठप्प करने वाले प्रयासों पर अंकुश या कारगर रोक लगाया जाना जरुरी हो जाता है। दो देशों के टकराव के चलते समूची दुनिया या दुनिया के अधिकांश देशों को संकट में नहीं ड़ाला जा सकता। दुनिया के देशों को इस दिशा में ठोस पहल करनी ही होगी। 

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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