By अंकित सिंह | Oct 17, 2026
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को समाजवादी पार्टी (सपा) की कड़ी आलोचना करते हुए उसे सैफई सिंडिकेट करार दिया। उन्होंने कहा कि 2017 से पहले अराजकता, टकराव और दंगे हमारी नियति बन गए थे। लखनऊ में बोलते हुए, मुख्यमंत्री ने राज्य की पिछली कानून-व्यवस्था की चुनौतियों और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शासन में मौजूदा स्थिति के बीच स्पष्ट अंतर बताया। उन्होंने कहा कि जहाँ पिछली सरकारों ने उत्तर प्रदेश को अराजकता और पहचान के संकट में धकेल दिया था, वहीं अब राज्य में शारदीय नवरात्रि और रामलीलाओं के बड़े आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से होते हैं, जिनमें परेशानी का रत्ती भर भी नामोनिशान नहीं होता।
सांप्रदायिक अशांति और कानून-व्यवस्था की विफलता को लेकर पिछली सपा सरकार पर निशाना साधते हुए, मुख्यमंत्री ने कहा कि 2017 से पहले, जश्न के बजाय हर तरफ अफरा-तफरी थी। उथल-पुथल, टकराव और दंगे हमारी नियति बन गए थे। 2017 में सत्ता संभालने के बाद से, आदित्यनाथ ने इस बदलाव का श्रेय सख्त पुलिसिंग और अपराध के प्रति 'जीरो-टॉलरेंस' (सख्त बर्दाश्त न करने की) नीति को दिया है। उनका दावा है कि इसी वजह से उत्तर प्रदेश दंगामुक्त राज्य बन गया है।
इसी कार्यक्रम में, लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के पांचवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए, मुख्यमंत्री ने भारत के राजनीतिक इतिहास के कुछ अहम पलों को याद किया। उन्होंने 1975 के आपातकाल और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का जिक्र करते हुए, देश के लोकतांत्रिक ढांचे में असहमति के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह वही उत्तर प्रदेश है, जिसके हाई कोर्ट ने 12 जून को भारत की सबसे शक्तिशाली कुर्सी पर बैठे व्यक्ति का चुनाव रद्द कर दिया था। ठीक 13 दिन बाद, इसके बदले में देश में आपातकाल (इमरजेंसी) लगा दिया गया... उस समय, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हंसराज खन्ना ने अकेले असहमति जताई थी, और उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन इतिहास कभी बेकार नहीं जाता। हाल ही में, आपने देखा होगा कि 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उसी अकेली असहमति को सही माना। 1975 ने देश को ‘कानून के शासन’ (rule of law) और ‘कानून के जरिए शासन’ (rule by law) के बीच का अंतर सिखाया। देश के लिए 1975 का यही सबक है।