By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | May 26, 2026
भले ही 1970 के तेल संकट जैसे हालात होने की संभावना ना हो या 2008 जैसी वित्तीय मंदी के हालात ना हो फिर भी एक बात साफ है कि अमेरिका-ईरान के बीच करीब तीन माह से चल रहे युद्ध के नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। चाहे एशिया के देश हो या फिर योरोपीय देश सभी केवल वैश्विक तनाव ही नहीं अपितु ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ते दामों को रोकने में विफल ही हो रहे हैं। पिछले दस-पन्द्रह दिनों में ही हमारे देश में पेट्रोल- एलपीजी-सीएनजी- पीएनजी के दामों में एक बार नहीं अपितु तीन बार बढ़ोतरी हो चुकी है। हांलाकि वर्तमान हालातों में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। विपक्ष चाहे लाख आरोप लगाये या आंदोलन-प्रदर्शन करें पर अंतरराष्ट्रीय हालातों से आंख नहीं मूंदनी चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमजन से आग्रह को भी इसी संदर्भ में सकारात्मकता से लिया जाना चाहिए। वैसे भी जब संकट का दौर हो और उस संकट के लिए हम या हमारी सरकार जिम्मेदार नहीं हो तो फिर देश में नकारात्मक माहौल बनाने के स्थान पर सकारात्मक माहौल बनाया जाना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति या किसी एक दल का नहीं अपितु सभी राजनीतिक दलों का दायित्व हो जाता है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। ईधन संकट का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान युद्ध ना होकर अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण हार्मुज संकट बन गया है। हार्मुज के रास्ते से ही कच्चे तेल की आपूर्ति होती है और तनाव के चलते हार्मुज जनडमरुमध्य रास्ते को अवरुद्ध कर दिया गया है इससे आपूर्ति प्रभावित हो रही है। यह तो वैकल्पिक उर्जा के रुप में देश में सोलर, विण्ड एनर्जी के क्षेत्र में पिछले सालों में योजनावद्ध तरीके से तेजी से और बेहतर काम हुआ है और इसी का परिणाम है कि आज प्रधानमंत्री इलेक्ट्रोनिक वाहनों के उपयोग या सोलर एनर्जी के उपयोग पर खुले तौर पर आग्रह करने की स्थिति में है। नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र में देश में तेजी से काम हुआ है और हो रहा है जो एक हद तक संकट को कम करने में सहायक बन रहा है।
एक बात साफ हो जानी चाहिए कि लोजिस्टिक लागत बढ़ेगी तो उसका असर सभी वस्तुओं में देखने को मिलेगा। भारत सरकार वेनेजुएला से वैकल्पिक तरीके से कच्चे तेल लाने का प्रयास कर रही है तो अन्य विकल्प भी खोजे जा रहे हैं। पर यह साफ हो जाना चाहिए कि कच्चे तेल की आपूर्ति जब तक सामान्य नहीं हो जाती तब तक पूरी तरह से संकट समाप्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इन वैश्विक हालातों के पीछे अमेरिका-ईरान की हठधर्मिता ही है। अमेरिका-इजरायल ने ईरान से लड़ाई शुरु करते समय रुस यूक्रेन युद्ध के हालातों से सबक नहीं लिया। रुस के सामने यूक्रेन पिद्दी सा देश होने के बावजूद आज तीन साल से भी अधिक समय होने के बावजूद निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है। पर अमेरिका ने यह सोचा था कि दो-तीन दिन में ही ईरान को घुटने टिकवा देंगे और यही अमेरिका की नासमझी रही। मानो या ना मानो पर वास्तविकता यह है कि आज अमेरिका के सामने अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने का संकट आ गया है और यही कारण है कि अंदरखाने अमेरिका और ट्रंप किसी भी तरह से सीज फायर के लिए प्रयासरत है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि युद्ध में नुकसान अमेरिका को ही अधिक हो रहा है। ईरान तो अपने घर से लड़ रहा है और उसके निशाने पर आसपास के देश है। ऐसे में स्टेक तो अमेरिका-इजरायल का ही हो जाता है। इसके अलावा एक बात और समझनी होगी कि ट्रंप 2 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आये दिन तुगलकी फरमान जारी कर दुश्मन ही दुश्मन बनाएं है। गली के गुंडे जैसी पहचान बन गई है ट्रंप की तो दूसरी और अमेरिका के ही अधिकांश लोगों का भरोसा ट्रंप ने खो दिया है। ऐसे में सम्मानजनक सीजफायर ही अमेरिका के लिए अब इस संकट से निकलने का रास्ता रह गया है और इसके लिए ही अंदरखाने प्रयास जारी है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा