Prabhasakshi NewsRoom: जजों के खिलाफ तेजी से बढ़ रहीं शिकायतें, 8630 Complaints के आंकड़े ने सबको चौंकाया

By नीरज कुमार दुबे | Feb 14, 2026

न्याय व्यवस्था से जुड़े तीन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों ने देश में न्यायिक जवाबदेही, नेतृत्व और समय पर न्याय को लेकर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। एक ओर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की संख्या का विशाल आंकड़ा सामने आया है, दूसरी ओर न्यायिक नेतृत्व को लेकर विनम्रता और सतत सीख की आवश्यकता पर जोर दिया गया है और साथ ही आरक्षित निर्णयों को लंबे समय तक सार्वजनिक न करने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी की गई है। इन तीनों पहलुओं को साथ रखकर देखने पर न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों और सुधार की दिशाओं की स्पष्ट झलक मिलती है।

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कानून मंत्री ने स्पष्ट किया कि ऐसी शिकायतों के निपटान के लिए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित आंतरिक प्रक्रिया लागू होती है। इस प्रक्रिया के तहत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें सुनने का अधिकार मुख्य न्यायाधीश को है। इसी तरह उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण से जुड़ी शिकायतें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देखते हैं। सरकार को जो शिकायतें मिलती हैं, वे भी आगे आवश्यक कार्यवाही के लिए मुख्य न्यायाधीश या संबंधित मुख्य न्यायाधीश को भेज दी जाती हैं।

कानून मंत्री ने अपने लिखित उत्तर में कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान में निहित है और न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का निपटान न्यायपालिका स्वयं अपनी आंतरिक व्यवस्था के माध्यम से करती है। यह आंतरिक प्रक्रिया वर्ष 1997 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित दो संकल्पों से विकसित हुई थी जिनमें न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्पाठ किया गया था। इन मूल्यों में आचरण के मानक और सिद्धांत तय किए गए हैं, जिनका पालन अपेक्षित है। यदि कोई न्यायाधीश इन मान्य मूल्यों का पालन नहीं करता तो सुधारात्मक कदम उठाने का भी प्रावधान है। इसके अलावा सरकार के पास एक केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी तंत्र भी है, जो एक ऑनलाइन मंच के रूप में काम करता है और विभिन्न मंत्रालयों तथा विभागों से जुड़ा है।

इसी परिप्रेक्ष्य में न्यायिक नेतृत्व पर भी महत्वपूर्ण विचार सामने आए हैं। नई दिल्ली में राष्ट्रमंडल न्यायिक शिक्षकों की बैठक के उद्घाटन अवसर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि जब न्यायाधीश स्वयं को पूर्ण और त्रुटिरहित मानने लगते हैं तब न्यायिक नेतृत्व को हानि होती है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि नियुक्ति के समय ही न्यायाधीश पूरी तरह तैयार और परिपूर्ण होते हैं, जबकि यह सोच संस्था के लिए हितकर नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायिक नेतृत्व इस कारण कमजोर नहीं होता कि न्यायाधीश अपूर्ण हैं, बल्कि तब होता है जब वह अपनी अपूर्णता को स्वीकार नहीं करते।

उन्होंने उपनिषद की उक्ति विद्या ददाति विनय का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्ची शिक्षा विनम्रता लाती है। इतिहास में वही न्यायिक नेता अधिक सम्मानित रहे जो अपनी जानकारी की सीमाओं से सचेत रहे और सुधार के लिए खुले रहे। उन्होंने कहा कि विनम्रता केवल निजी गुण नहीं बल्कि पेशेवर सुरक्षा कवच भी है और हर न्यायिक अधिकारी को यह सीख दी जानी चाहिए। इस तरह की अंतरराष्ट्रीय बैठकों को उन्होंने आत्मचिंतन का अवसर बताया, जहां तात्कालिक सुधार भले न दिखें पर सोच में बदलाव के जरिये संस्थाएं धीरे धीरे बदलती हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बदलती दुनिया में न्यायाधीशों को नैतिक और तकनीकी दोनों चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें निरंतर सीखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कानून एक जीवंत व्यवस्था है जो समय के साथ बदलती है, इसलिए परंपरा की समझ के साथ वर्तमान की जरूरतों के अनुसार व्याख्या भी जरूरी है।

तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा समय पर निर्णय उपलब्ध कराने से जुड़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा कि उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णय सुरक्षित रखकर महीनों तक सार्वजनिक न करना एक पहचानी जा सकने वाली बीमारी है जिसे समाप्त किया जाना चाहिए। एक मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई थी कि एक याचिका पर निर्णय मौखिक रूप से सुना दिया गया था पर उसे अपलोड नहीं किया गया। इस पर पीठ ने कहा कि यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है और संबंधित पक्ष को शीघ्र पूर्ण निर्णय उपलब्ध कराया जाए।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कुछ न्यायाधीश बहुत परिश्रम से कई मामलों की सुनवाई कर लेते हैं और निर्णय सुरक्षित रखते हैं, पर बाद में उन्हें समय पर जारी नहीं कर पाते। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी एक व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था के सामने चुनौती है, जिसका उपचार जरूरी है ताकि यह प्रवृत्ति फैले नहीं। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के साथ बैठक में चर्चा की जाएगी और समाधान खोजा जाएगा। उन्होंने कहा कि पहले भी निर्देश दिए जा चुके हैं कि हर निर्णय में आरक्षण, उच्चारण और अपलोड की तिथि साफ दर्ज हो।

इन तीनों घटनाक्रमों को साथ देखें तो एक व्यापक चित्र उभरता है। शिकायतों की बढ़ती संख्या केवल असंतोष का संकेत नहीं बल्कि नागरिकों की जागरूकता और अपेक्षाओं का भी परिचायक है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता अनिवार्य है, पर स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। आंतरिक प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हैं, पर उनका प्रभाव तभी दिखेगा जब लोगों को भरोसा हो कि शिकायतों पर निष्पक्ष और समयबद्ध कार्यवाही होती है।

मुख्य न्यायाधीश द्वारा विनम्रता और सतत सीख पर दिया गया जोर न्याय व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। यदि न्यायिक नेतृत्व स्वयं सुधार के लिए खुला रहेगा तो संस्था का नैतिक बल बढ़ेगा। साथ ही समय पर निर्णय उपलब्ध कराना न्याय का मूल तत्व है। देर से मिला न्याय कई बार न्याय न मिलने जैसा होता है।

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