दलाई लामा को लेकर तिब्बतियों में चिंता, चीन है मौके की तालाश में!

By विजयेन्दर शर्मा | Jul 13, 2021

अपनी बढती उम्र के चलते भारत में निर्वासन में रहे रहे तिब्बतीयों के अध्यात्मिक नेता दलाई लामा के भविष्य को लेकर भारत से लेकर अमेरिका तक चिंता है हालांकि दलाई लामा किसी को राजनीतिक या कूटनीतिक चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन यह भी सच है कि दलाई लामा की ही वजह से तिब्बती अंदोलन ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यही वजह है इस बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्दर मोदी ने दलाई लामा को उनके जन्म दिन पर बधाई दी तो उसे  बड़ी कूटनीतिक पहल के रूप में लिया गया। जिससे तिब्बतीयों में नई आशा की किरण जगी है तो चीन ने को यह नागवार गुजरा है हालांकि भारत आधिकारिक रूप से तिब्बत को चीनी लोक गणराज्य का अंग मानता रहा है। लेकिन मोदी की पहल के अपने मायने हैं। 

इसे भी पढ़ें: असम में पुलिस मुठभेड़ में एनएलएफबी का उग्रवादी ढेर, बरामद किए गए पिस्तौल और कई कारतूस

दलाई लामा अपनी लड़ाई को सांस्कृतिक स्वायत्तता की मांग तक सीमित रखते हैं, जिस पर निर्वासित तिब्बतियों की नई पीढ़ी दबे ढंग से उनके प्रति नाराजगी भी जताती रही है। लेकिन दलाई लामा को गांधी का आध्यात्मिक बेटा यूं ही नहीं कहा जाता। निर्वासित तिब्बतियों में तिब्बत पर चीन के आधिपत्य को लेकर कई धाराएं पहले दिन से ही मौजूद रही हैं। तिब्बत का मुद्दा आज भी दुनिया के लिए दिलचस्प बना हुआ है तो इसकी अकेली वजह यह है कि उसे दलाई लामा का नेतृत्व हासिल है। हम इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि निर्वासित तिब्बतियों में कितनी तरह के क्षेत्रीय और सांप्रदायिक टकराव मौजूद हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म के चार संप्रदायों में सैकड़ों साल से आपसी लड़ाइयां चल रही हैं और वे हाल तक जाहिर होती रही हैं। पूर्वी तिब्बत का लड़ाकू खाम इलाका खुद को लंबे समय से ल्हासा के आधिपत्य से मुक्त मानता आया है। लेकिन दलाई लामा के प्रभाव में ये सारे टकराव इतने मंद पड़ गए हैं कि बाहरी लोग उनके बारे में नहीं जानते और निर्वासित तिब्बती संसद में हर खेमा तिब्बत की आजादी या स्वायत्तता के साझा मुद्दे पर एकजुट दिखता है। इस लड़ाई को ज्यादा उग्र बनाने पर भीतरी टकराव उभर आने का भी खतरा है। अभी, दलाई लामा के 86 पार करने पर निर्वासित तिब्बतियों के बीच इस बात को लेकर भी बातचीत जारी है कि दलाई लामा के बाद उनकी लड़ाई कैसे आगे बढ़ेगी।

इसे भी पढ़ें: PM मोदी बोले- पर्यटन स्थलों और बाजारों में बिना मास्क भारी भीड़ का नजर आना चिंता का विषय

इसमें एक पहलू उनके उत्तराधिकार का है, जिस पर अमेरिका ने अपने यहां कानून पारित कर रखा है और चीन के बाहर पूरी दुनिया में इस पर सहमति है कि यह मसला तिब्बतियों को ही तय करने दिया जाना चाहिए।खुद चीन का कहना है कि किसी भी बड़े लामा का अवतार चीन सरकार की मोहर के बिना सत्यापित नहीं होता। लेकिन अंततः यह एक धार्मिक मसला है। कल को चीनी अपनी मोहर वाला 15वां दलाई लामा खड़ा भी कर देंगे तो कोई तिब्बती उसे पूजने नहीं जाएगा। बहरहाल, निर्वासित तिब्बतियों के लिए चिंता इससे आगे की है। 14वें दलाई लामा के बाद वे अपनी मर्जी का दलाई लामा तो चुन लेंगे, लेकिन उसके मजबूत होने तक तिब्बतियों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा? निर्वासित तिब्बती संसद और खासकर प्रधानमंत्री पेनपा त्सेरिंग को अब इस पहलू पर ज्यादा काम करना चाहिए।

प्रमुख खबरें

Superfoods का मिथ! महंगे Avocado-Quinoa नहीं, ये देसी चीजें हैं असली Health-Booster

Shiv Sena Split History | बाल ठाकरे के दौर से एकनाथ शिंदे तक: जब टूटी शिवसेना, जानिए उन 4 बड़ी बगावतों की कहानी जिसने महाराष्ट्र की सियासत को बदल दिया

Gurugram Police की बड़ी कार्रवाई! 370 की बिरयानी विवाद में कॉमेडियन Pranit More और Himanshu Jangra पर FIR दर्ज, वीडियो हटाने के निर्देश

Maharashtra Politics : महाराष्ट्र में नए सियासी भूकंप की आहट! उद्धव गुट के 7 सांसदों की बगावत, शिंदे सेना में विलय का पूरा प्लान