By रेनू तिवारी | Jun 17, 2026
भारतीय राजनीति के पन्नों में महाराष्ट्र एक बार फिर बड़े सत्ता परिवर्तन और कूटनीतिक हलचल का गवाह बनने जा रहा है। पश्चिम बंगाल के सियासी घटनाक्रमों के बाद, अब पश्चिमी भारत के इस सबसे महत्वपूर्ण राज्य में एक बड़े राजनीतिक उलटफेर की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। राजनीतिक गलियारों में तैरती खबरों और बेहद पुख्ता सूत्रों के अनुसार, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के भीतर असंतोष का गुबार फूटने की कगार पर है। खबर है कि पार्टी के 7 मौजूदा लोकसभा सांसद उद्धव का हाथ छोड़कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने का मन बना चुके हैं। यह संभावित टूट न केवल उद्धव ठाकरे के सांगठनिक ढांचे को हिलाकर रख देगी, बल्कि आगामी चुनावों से पहले उनके राजनीतिक कद के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
इस पूरी बगावत को अमलीजामा पहनाने के लिए बागी धड़े ने एक बेहद सोची-समझी और कानूनी रूप से सुरक्षित रणनीति तैयार की है:
स्वतंत्र समूह की मांग: सूत्रों का कहना है कि ये सातों सांसद आज ही देश की राजधानी दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिरला से एक विशेष मुलाकात कर सकते हैं। इस बैठक के दौरान वे संसद के भीतर खुद को एक अलग और स्वतंत्र विधायी समूह (Separate Group) के रूप में मान्यता देने का औपचारिक प्रस्ताव रखेंगे।
शिंदे गुट में विलय: दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कानूनी जटिलताओं और अपनी सदस्यता जाने के खतरे से बचने के लिए, एक बार अलग समूह की मान्यता मिलते ही यह पूरा धड़ा एकनाथ शिंदे की मूल शिवसेना में समाहित (Merger) हो जाएगा।
श्रीकांत शिंदे के घर 'सीक्रेट' बैठक: इस बड़े सियासी कदम को उठाने से पहले इन सभी सांसदों के दिल्ली में सांसद श्रीकांत शिंदे (मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के सुपुत्र) के सरकारी आवास पर जुटने की खबर है। इस रणनीतिक बैठक में खुद सीएम एकनाथ शिंदे की मौजूदगी इसकी गंभीरता को बयां करती है।
कटघरे में उद्धव सेना: बगावत की राह पर चल रहे इन 7 सांसदों की कुंडली
जो सात चेहरे इस समय महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक की राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं, वे अपने-अपने क्षेत्रों में गहरी पकड़ और बड़ा जनाधार रखते हैं। उनकी संक्षिप्त प्रोफाइल इस प्रकार है:
1. संजय दीना पाटिल (मुंबई उत्तर-पूर्व)
मुंबई के उपनगरीय और जमीनी इलाकों में संजय दीना पाटिल का एक बड़ा राजनीतिक रसूख है। पूर्व विधायक और पूर्व सांसद रह चुके पाटिल को मुंबई महानगर में शिवसेना (UBT) का एक प्रमुख चेहरा और मजबूत रणनीतिकार माना जाता है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में उनका इस तरह अलग होना उद्धव गुट के लिए एक बड़ा सांगठनिक झटका है।
2. संजय जाधव (परभणी, मराठवाड़ा)
मराठवाड़ा की सियासत में संजय जाधव एक बेहद सीनियर और कद्दावर नाम हैं। कई बार लोकसभा के सदस्य चुने जा चुके जाधव परभणी और आसपास के क्षेत्रों में पार्टी के सांगठनिक स्तंभ माने जाते हैं। शिवसेना के समर्पित कैडर बेस और वोट बैंक पर उनकी पकड़ को हिला पाना विरोधियों के लिए भी बेहद मुश्किल रहा है।
3. राजाभाऊ प्रकाश वाजे (नासिक)
उत्तर महाराष्ट्र के नासिक से सांसद राजाभाऊ वाजे पहले सिन्नर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने इस पूरे बेल्ट में अपनी एक अलग और मजबूत छवि बनाई है। संसद के पटल पर वे लगातार सफाई कर्मचारियों के कल्याण और विस्थापितों के पुनर्वास जैसी जमीनी नीतियों के लिए आवाज उठाते रहे हैं। नासिक मंडल में वे एक प्रभावशाली नेता हैं।
4. भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे (शिर्डी)
अहमदनगर जिले के शिर्डी लोकसभा क्षेत्र से आने वाले भाऊसाहेब वाकचौरे पूरी तरह से ग्रामीण पृष्ठभूमि के नेता हैं। पहले भी इसी सीट से सांसद रह चुके वाकचौरे कृषि संकट, सिंचाई परियोजनाओं और ग्रामीण विकास के मुद्दों पर हमेशा मुखर रहे हैं। शिरडी और उसके ग्रामीण अंचलों में उनका गहरा व्यक्तिगत प्रभाव है।
5. संजय उत्तमराव देशमुख (यवतमाल-वाशिम, विदर्भ)
विदर्भ जैसे महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में शिवसेना (UBT) की मौजूदगी को बनाए रखने का श्रेय संजय उत्तमराव देशमुख को जाता है। राज्य की राजनीति का एक लंबा और तगड़ा अनुभव रखने वाले इस मंझे हुए राजनेता की सीट यवतमाल-वाशिम रणनीतिक रूप से उद्धव सेना के लिए पूर्वी महाराष्ट्र का सबसे बड़ा किला मानी जाती रही है।
6. नागेश पाटिल अष्टिकर (हिंगोली)
मराठवाड़ा के हिंगोली से सांसद नागेश पाटिल अष्टिकर पूर्व में विधायक के रूप में काम कर चुके हैं और संगठन के जमीनी ढांचे में उनकी पैठ बहुत गहरी है। ग्रामीण मतदाताओं के बीच उनकी छवि एक सुलभ और सक्रिय नेता की है, जो लगातार खेती-किसानी और सिंचाई से जुड़ी समस्याओं को लेकर संघर्ष करते आए हैं।
7. ओमराजे निंबालकर (धाराशिव)
मराठवाड़ा के सबसे लोकप्रिय और आक्रामक युवा नेताओं में शुमार ओमराजे निंबालकर धाराशिव (पूर्व में उस्मानाबाद) से लगातार दूसरी बार लोकसभा पहुंचे हैं। सूखा पीड़ित इस क्षेत्र में पानी की गंभीर समस्या, किसानों के संकट और युवाओं की बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर संसद से सड़क तक लड़ने वाले निंबालकर का झुकाव बदलना उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ा भावनात्मक और राजनीतिक आघात माना जा रहा है।
बदलते समीकरण: क्या फिर इतिहास दोहरा रहा है?
महाराष्ट्र की यह मौजूदा स्थिति साल 2022 के उस घटनाक्रम की याद दिलाती है, जब एकनाथ शिंदे ने विधायकों की भारी संख्या के साथ बगावत कर महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार को गिरा दिया था। यदि ये सात सांसद भी औपचारिक रूप से शिंदे गुट के साथ चले जाते हैं, तो संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में उद्धव ठाकरे की पार्टी के पास संख्या बल बेहद कम रह जाएगा। यह बदलाव आगामी विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों के समीकरणों को पूरी तरह से पलट कर रख सकता है।
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