झाड़ू को नहीं मिला हाथ का साथ, अकेले दे पाएंगे भाजपा को मात

By अभिनय आकाश | Apr 23, 2019

साधारण सी चप्पल, ढीले-ढाले शर्ट और पैंट में कक्षा के किसी आज्ञाकारी छात्र की तरह अरविंद केजरीवाल के गठबंधन करने के सविनय निवेदन को खारिज़ करते हुए आखिरकार कांग्रेस ने सभी सात सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए। कांग्रेस ने गठबंधन में गिरफ्तार होने से बेहतर दिल्ली की चुनावी अदालत में जनता के बीच पार्टी की जमानत को सलामत रखने के लिए दिग्गजों को मैदान में उतार दिया। लंबे इंतजार और आम आदमी पार्टी से गठबंधन के कयासों को विराम देते हुए आखिर में कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है। वहीं भाजपा ने भी तीन टुकड़ों में अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर दी है। जिस दिल्ली से देश की सत्ता चलती है उसी दिल्ली की सात सीटों पर उम्मीदवार उतारने के लिए राजनीतिक दलों को सबसे ज्यादा देर लग गई। इस देरी में किसी का दिल टूटा तो किसी का डर भी छूटा। सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बाद अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के दरवाजे पर नाक रगड़ते और मिन्नते करते रहे लेकिन राहुल ने कभी दिल्ली की सत्ता से कांग्रेस को किनारा करने वाले केजरीवाल से किनारा करते हुए सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी नामित कर दिए। प्रत्याशियों की लिस्ट सामने आने के बाद कांग्रेस और आप के गठबंधन की बची हुई एक प्रतिशत उम्मीद भी खत्म हो गई।

दिल्ली के दंगल में भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों ने अपने सियासी पहलवान उतार दिए हैं। राजधानी दिल्ली की सबसे हाट सीट उत्तर पूर्वी लोकसभा जहां से “दिल्ली की गलियों से हो रहा मुहूर्त है पांच साल और हमें मोदी की जरुरत है” के नारे के साथ भाजपा के सांसद मनोज तिवारी एक बार फिर से चुनावी मैदान में हैं तो वहीं तीन बार दिल्ली की सीएम रहीं शीला दीक्षित ने पुराने दिनों की याद कराते हुए कह रहीं है कि इसी इलाके से मैंने मेट्रो शुरु की थी और उत्तर पूर्वी दिल्ली से तो पुराना रिश्ता है। आम आदमी पार्टी ने इस सीट से अरविदं केजरीवाल के करीबी दिलीप पांडे को उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। इस सीट की सबसे खास बात यह है कि तीनों ही उम्मीदवार ब्राह्मण है और तीनों ही मूल रुप से दिल्ली के नहीं हैं। चांदनी चौक सीट की बात करें तो भाजपा ने एक बार फिर से हर्षवर्धन पर भरोसा जताया है। कांग्रेस के दो बार सांसद जेपी अग्रवाल मैदान में और आप ने पंकज गुप्ता पर भरोसा जताया है। इस सीट पर दिलचस्प बात ये रही कि कांग्रेस के सांसद रह चुके कपिल सिब्बल ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। सिब्बल ने पार्टी की जीत पर कहा कि दिल्ली में त्रिकोणीय मुकाबला है और यहां जीतना काफी मुश्किल है। बात अगर पश्चिमी दिल्ली सीट की करें तो भाजपा ने एक बार फिर प्रवेश वर्मा को टिकट दिया है वहीं बिहार के भूमिहार महाबल मिश्रा कांग्रेस के टिकट पर मैदान में तो आप ने बलवीर जाखड़ को मैदान में उतारा है। बात अगर दक्षिणी दिल्ली सीट की करें तो भाजपा के सांसद रमेश बिधुड़ी के सामने 30 साल के राघव चड्डा ने पालम से तुगलाकाबाद के बीच रोड शो कर अपनी ताकत का अहसास कराया। कांग्रेस ने इस सीट से बाक्सर विजेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है। नई दिल्ली लोकसभा सीट पर नजर डालें तो राहुल के खिलाफ अवमानना की याचिका डालकर इन दिनों चर्चा में रहने वाली मीनाक्षी लेखी पर भाजपा ने फिर से भरोसा जताया तो कांग्रेस ने पूर्व खेल मंत्री अजय माकन को सियासी खेल में मात देने के लिए आगे कर दिया। आप की ओर से बृजेश गोयल पहले से ही घोषित प्रत्याशी थे। लेकिन एक और चर्चित मुकाबला  पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट पर देखने को मिलेगा जहां भाजपा ने वर्तमान सांसद महेश गिरि की बजाय क्रिकेटर गंभीर को अपना उम्मीदवार बनाया है। क्रिकेट की दुनिया से राजनीति में कदम रखने वाले गौतम गंभीर का मुकाबला कांग्रेस से भाजपा और फिर कांग्रेस में घर वापसी करने वाले अरविंदर सिंह लवली और आम आदमी पार्टी की आतिशी से होगा। उत्तर पश्चिमी दिल्ली लोकसभा सीट जिसपर उम्मीदवार तय करने के लिए भाजपा को नामांकन की आखरी तारीख तक का इंतजार करना पड़ा और फिर इस सुरक्षित सीट से वर्तमान सांसद उदित राज का टिकट काटकर गायक हंसराज हंस को टिकट दिया गया जबकि कांग्रेस ने राजेश लिलोथिया और आप ने गुगन सिंह को प्रत्याशी बनाया है।

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भाजपा ने 2014 में दिल्ली की सभी सात सीटों पर क्लीन स्वीप किया था तो 2009 में सभी सात सीटें कांग्रेस के खाते में गई थी। लेकिन अब आम आदमी पार्टी की इंट्री के बाद सभी सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। वैसे भी राजनीति संभावनाओं का खेल है और भविष्य की संभावनाएं जिंदा रखने के लिए इस खेल को अंतिम क्षण तक खेलना सियासतदारों की मजबूरी भी है और जरूरी भी। इस नई संभावनाओं की प्रयोगस्थली बने दिल्ली में एक तरफ भाजपा क्लीन स्वीप कर फिर से एक बार मोदी सरकार के नारे के साथ दिल्ली के सल्तनत पर काबिज होना चाह रही है तो कांग्रेस अपनी खोयी हुई जमीन को फिर से दिल्ली के जरिये जिंदा करने की चाह लिए मैदान में है। पंजाब और गोवा में मनमाफिक सफलता न मिलने के बाद आम आदमी पार्टी भी अगले साल होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले नई संभावना तलाश रही है। राजधानी के रणक्षेत्र में 12 मई को मतदान होना है। जिसके बाद ही पता चल सकेगा कि दिल्ली के दिल में क्या है?

- अभिनय आकाश

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