By कमलेश पांडे | May 28, 2026
कर्नाटक में कांग्रेस इस समय एक गहरे राजनीतिक धर्मसंकट में दिखाई दे रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री बदलकर उसने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। जिस तरह से आलाकमान के निर्देश पर सिद्धारमैया की जगह डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है, वह दूरदर्शिता का परिचायक है। लेकिन सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री बदलने से समस्या का स्थायी हल निकल चुका है? या फिर कोई और नई समस्या पनपेगी! कांग्रेस का अतीत इसी बात की चुगली करता है।
इसलिए आइए पहले कर्नाटक कांग्रेस के मौजूदा समीकरण को समझते हैं। वह यह कि वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया राज्य में जनाधार और प्रशासनिक अनुभव वाले नेता माने जाते हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार संगठन, संसाधन और रणनीतिक राजनीति के मजबूत स्तंभ हैं। चूँकि गत 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में दोनों की बड़ी भूमिका रही थी। इसलिए सत्ता संतुलन शुरू से ही संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। उम्मीद है कि अब डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने से पार्टी को मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि मुख्यमंत्री बदलना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन का प्रश्न बन चुका था, जो अब जाकर पूरा हुआ।
ऐसे में सुलगता सवाल है कि आखिर दोनों नेताओं के बीच का संतुलन कैसे बदला और क्या मुख्यमंत्री बदलने से इसका हल निकल सकता है? तो जवाब होगा कि सैद्धांतिक रूप से नेतृत्व परिवर्तन से असंतोष कम किया जा सकता है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति में ऐसा प्रयोग हमेशा सफल नहीं होता। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि बदलाव सहमति से हुई या दबाव में, सत्ता हस्तांतरण सम्मानजनक हुआ या टकरावपूर्ण, संगठन और विधायकों का समर्थन किसके साथ रहे और जनता इसे स्थिरता माने या आंतरिक संघर्ष। क्योंकि यदि बदलाव “समझौते” की तरह दिखाई दिया है, तो कांग्रेस इसे संतुलन की राजनीति कह सकती है। लेकिन विपक्ष इस लंबी चली खींचतान को अस्थिरता के रूप में ही पेश करेगा।
पहला, राजस्थान मॉडल: बदलाव टला, लेकिन संघर्ष बढ़ा। आपने गौर किया होगा कि राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय तक नेतृत्व संघर्ष चला। फिर भी कांग्रेस हाईकमान स्पष्ट निर्णय लेने से बचता रहा। नतीजा यह निकला कि सरकार लगातार अंदरूनी तनाव में रही और युवा बनाम वरिष्ठ नेतृत्व की बहस तेज हुई। इससे चुनावी नैरेटिव कमजोर हुआ और अंततः सूबाई सत्ता भाजपा के हाथों गंवानी पड़ी। यह उदाहरण बताता है कि “निर्णय टालना” भी कभी-कभी संकट को लंबा कर देता है और विनाशकारी प्रभाव छोड़ता है।
दूसरा, मध्यप्रदेश मॉडल: असंतोष की कीमत सत्ता गंवाकर चुकाई। आपने महसूस किया होगा कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच बढ़ते असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया। आखिरकार सिंधिया समर्थक विधायकों के जाने से कांग्रेस सरकार गिर गई। यह कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सबक बना कि केवल “हाईकमान नियंत्रण” हर बार पर्याप्त नहीं होता।
तीसरा, पंजाब मॉडल: नेतृत्व परिवर्तन उल्टा भी पड़ सकता है। आपने समझा होगा कि पंजाब में कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया। उद्देश्य था एंटी-इन्कम्बेंसी कम करना और सामाजिक समीकरण मजबूत करना। लेकिन पार्टी के भीतर विभाजन और बढ़ गया। इससे संगठनात्मक भ्रम पैदा हुआ और चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ। इससे यह संदेश गया कि देर से किया गया नेतृत्व परिवर्तन हमेशा लाभकारी नहीं होता।
देखा जाए तो कांग्रेस के सामने फिलवक्त तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं:- एक, स्थिरता बनाम महत्वाकांक्षा: यदि बदलाव नहीं हुआ तो एक धड़ा असंतुष्ट रह सकता है। यदि बदलाव हुआ तो दूसरा धड़ा अस्थिर हो सकता है। दूसरा, दक्षिण भारत का राजनीतिक महत्व: कर्नाटक फिलहाल दक्षिण भारत में कांग्रेस की सबसे बड़ी सत्ता है। यह राज्य केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति का केंद्र बन चुका है। तीसरा, भाजपा को अवसर न मिले: भारतीय जनता पार्टी लगातार कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर नजर रखे हुए है। लिहाजा कांग्रेस जानती है कि सार्वजनिक संघर्ष विपक्ष को बड़ा मुद्दा दे सकता है।
कांग्रेस संभवतः विभिन्न रास्तों पर विचार कर रही होगी: पहला, समयबद्ध सत्ता परिवर्तन और फिर संगठन और सरकार के बीच नई जिम्मेदारियों का बंटवारा। मुख्यमंत्री बदलने के बाद उसकी सबसे संभावित रणनीति फिलहाल यही दिखती है कि पार्टी किसी भी बदलाव को “संघर्ष” नहीं बल्कि “सहमति” के रूप में प्रस्तुत करना चाहेगी।
वास्तव में अतीत कांग्रेस को यह सिखाता है कि नेतृत्व परिवर्तन न करना भी जोखिम है और गलत समय पर करना उससे बड़ा जोखिम। इसलिए कर्नाटक में पार्टी इसी संतुलन को साधने की कोशिश कर चुकी है, क्योंकि यहां गलती केवल राज्य सरकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश को भी प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि कर्नाटक में कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन यानी मुख्यमंत्री बदलने का निर्णय बेहद सावधानी पूर्वक किया गया है, क्योंकि पार्टी को यह एहसास है कि सत्ता परिवर्तन की आंतरिक राजनीति कई राज्यों में उसे भारी नुकसान पहुँचा चुकी है। यही कारण है कि पार्टी राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति से बचना चाहती दिख रही थी और उसने डी के शिवकुमार के धैर्य और प्रयासों को ग्रेस दिया।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक