Jatland कहे जाने वाले Rohtak, Jhajjar और Sonipat में Congress की हालत पतली, हुड्डा का राजनीतिक भविष्य लगा दाँव पर

By नीरज कुमार दुबे | Oct 04, 2024

चुनावों के दौरान किसी एक परिवार या एक नेता को ही सारा दारोमदार सौंपना कितना भारी पड़ सकता है, हरियाणा इसकी मिसाल बन सकता है। हरियाणा में भाजपा सरकार के खिलाफ उपजी नाराजगी का फायदा उठाने में कांग्रेस नाकाम होती दिख रही है क्योंकि उसने यहां एकजुट होकर नहीं बल्कि खेमों में बंट कर चुनाव लड़ा है। कांग्रेस पार्टी को जीत दिलाने का सारा जिम्मा जिस तरह भूपिंदर सिंह हुड्डा के कंधों पर डाला गया और इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए हुड्डा ने कांग्रेस के अन्य नेताओं को जिस तरह किनारे किया उसका विपरीत असर कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर हो सकता है।

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रोहतक में अगर किलोई विधानसभा क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो जिले की बाकी बची तीन सीटों पर भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। भाजपा के स्टरा प्रचारकों की रैली काम कर गई है। रोहतक सिटी जिसे भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपना होम टाउन मानते हैं वहां से भी भाजपा की सीट निकालती हुई नजर आ रही है। कांग्रेस प्रत्याशी की हालत पतली होती दिखाई दे रही है। पूर्व सहकारिता मंत्री और भाजपा प्रत्याशी मनीष ग्रोवर मजबूत स्थिति में आ गए हैं। 2019 में कांग्रेस ने जिन सीटों पर अपनी जमीन मजबूत की थी वहां कमल खिलता हुआ नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव से ठीक 24 घंटे पहले हुए कांग्रेस के इंटरनल सर्वे ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ-साथ कांग्रेस हाई कमान की नींद भी उड़ा दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रोहतक, झज्जर और सोनीपत में कांग्रेस के बागियों के कारण बहुत लंबे समय बाद मुकाबला एक तरफा होता हुआ दिखाई दे रहा है। केवल खरखौदा सीट पर कांग्रेस और भाजपा का मुकाबला है, लेकिन यहां भी कांग्रेस की हालत उतनी ठीक नहीं है। सोनीपत और गोहाना में भाजपा के प्रत्याशियों ने मुकाबले को एक तरफा कर दिया है। राई, गन्नौर और बरोदा में कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनाव मुकाबले में पसीना आ रहा है। इन तीनों विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा और निर्दलीय प्रत्याशियों ने कांग्रेस को त्रिकोणीय मुकाबले से बाहर कर दिया है। जाट लैंड का सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले सोनीपत में वोटर्स ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व को नकार दिया है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने गोहाना, बरोदा, खरखौदा और सोनीपत में जो बाजी मारी थी वह बाजी इस कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है। 

रोहतक और झज्जर की आठ विधानसभा सीट की बात करें तो यहां भी समीकरण एकाएक बदल गए हैं। यहां भी अधिकतर सीट पर कांग्रेस की हालत खस्ता है। रोहतक जिले की कलानौर और महम विधानसभा सीट पर चल रही टफ लड़ाई में कांग्रेस के प्रत्याशी कमजोर नजर आ रहे हैं। इसका एक कारण कांग्रेस नेताओं द्वारा जनता के बीच में नहीं रहना और जनता के काम नहीं करना है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यदि रोहतक में भूपेंद्र सिंह हुड्डा एक या दो सीटों पर निपट गए तो उनके मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर ग्रहण लग जाएगा। झज्जर और बादली में कांग्रेस प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर मिल रही है। ऐसे ही बहादुरगढ़ और बेरी में टफ मुकाबला है। लोगों ने कहा कि इस बार झज्जर में कांग्रेस हाफ हो सकती है, इसलिए झज्जर जिले की चारों सीटों को साधने के लिए राहुल गांधी को जीटी रोड बेल्ट छोड़कर बहादुरगढ़ में रोड शो करना पड़ा। 

चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने घर में घिरते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गोहाना रैली और भाजपा के अन्य दिग्गजों की रैलियों ने जाट लैंड कहे जाने वाले सोनीपत, रोहतक और झज्जर के सियासी व जातीय समीकरणों को तोड़ने का काम किया। भाजपा ने कांग्रेस राज में दलितों पर आत्याचार के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। इसका असर चुनाव परिणाम पर दिखेगा। भाजपा ने कांग्रेस को पर्ची व खर्ची व भ्रष्टाचार पर भी घेरा। इन सवालों का जवाब देने में कांग्रेस असफल रही। जिससे जाट लैंड में हवा कांग्रेस के खिलाफ जाती दिखाई दे रही है।

-नीरज कुमार दुबे

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