By योगेंद्र योगी | Mar 21, 2025
कांग्रेस ने शायद ठान ली है कि चाहे कुछ भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े पर वोट बैंक के लिए मुसलमानों से प्रेम कम नहीं होने वाला। ऐसे ही कारणों से कांग्रेस न सिर्फ केंद्र की सत्ता से बल्कि ज्यादातर राज्यों में भी सत्ता से बाहर है। दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस के कथित मुस्लिम प्रेम ने भारतीय जनता पार्टी का सत्ता का रास्ता आसान कर दिया। कांग्रेस की इस नीति ने खुद को तो दरबदर कर ही दिया, इससे देश के मुसलमानों को नुकसान पहुंचाया। मुसलमानों को बेवजह देश के प्रति वफादारी जाहिर करने पर मजबूर होना पड़ा। भाजपा ने कांग्रेस के जरिए मुसलमानों को भी घेरने में कसर बाकी नहीं रखी। ऐसे में बेवजह राजनीति में घसीटे गए मुसलमानों की मुश्किलें बढ़ गई। मुसलमान कांग्रेस के दिखावटी वोट प्रेम का विरोध नहीं कर सके और भाजपा के निशाने पर आ गए।
गौरतलब है कि यह आरक्षण पहली बार 1995 में एचडी देवेगौड़ा की जनता दल ने कर्नाटक में लागू किया था। दिलचस्प बात यह है कि देवगौड़ा की जद (एस) अब बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सहयोगी है। कर्नाटक सरकार के 14 फरवरी, 1995 के एक आदेश में जिक्र किया गया जिसमें बताया गया कि यह निर्णय चिन्नप्पा रेड्डी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है और आरक्षण को 50 प्रतिशत तक सीमित करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करता है। कांग्रेस ही नहीं किसी न किसी बहाने मुस्लिम वोट बैंक पर गैरभाजपा दलों की भी खीचतान रही है। विपक्षी दलों का प्रयास रहा है कि किसी भी तरह यह अल्पसंख्यक वोट बैंक छिटकना नहीं चाहिए, यही वजह है कि साफ तौर पर धर्म के आधार पर आरक्षण को राजनीति का मोहरा बनाया गया। केरल में ओबीसी को 30 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, जिसमें मुस्लिम समुदाय को नौकरियों में 8 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 10 प्रतिशत कोटा प्रदान किया गया। तमिलनाडु में पिछड़े वर्ग के मुसलमानों को 3.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, जिसमें मुस्लिम समुदाय की 95 प्रतिशत जातियां शामिल हैं। इसी तरह बिहार में ओबीसी को 32 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, जिसमें मुस्लिम समुदाय को 4 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया है। आंध्र प्रदेश में मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देने की कोशिश की गई थी, लेकिन कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। पश्चिम बंगाल में कुछ मुस्लिम जातियों को शामिल किया गया लेकिन अलग से कोटा नहीं दिया गया। उत्तर प्रदेश में भी 2005 में मायावती सरकार ने 18 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण का प्रस्ताव रखा, लेकिन कोर्ट ने रोक दिया। सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण आरक्षण का प्रावधान कानूनी है। इसकी भी सीमा है। सुप्रीम कोर्ट ने ५० प्रतिशत से अधिक आरक्षण के मामलों को खारिज किया है। इसके बावजूद राजनीतिक दलों का आरक्षण के प्रति लोभ संवरण कम नहीं हुआ। ऐेसा नहीं है कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल आरक्षण के जरिए वाकई मुसलमानों का भला चाहते हों, दरअसल इनकी नीयत में खोट है। यह खोट वोट बटोरने का है। क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक दायरा एक या दो राज्यों से अधिक नहीं है, किन्तु कांग्रेस का नेटवर्क देशभर में है। ऐसे में मुस्लिमों के मुद्दों को लेकर कांग्रेस को सर्वाधिक राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी है। भाजपा ने इसी आधार पर वोटों का धु्रवीकरण किया है। पता नहीं यह बात कांग्रेस को कब समझ आएगी कि देश के बहुसंख्यक वोट बैंक को नाराज करके देश की सत्ता किसी भी सूरत में हासिल नहीं की जा सकती। कांग्रेस जब तक तुष्टिकरण की नीति का त्याग नहीं करेगी, तब तक भविष्य में सत्ता तक पहुंचना उसके लिए आसान नहीं होगा।
- योगेन्द्र योगी