सावरकर मुद्दा फिर गर्माएगी कांग्रेस, अब उत्तर प्रदेश में बांटेगी विवादित पुस्तक

By अजय कुमार | Jan 30, 2020

मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं, राहुल गांधी है। सच बोलने पर, मैं माफी नहीं मांगूंगा। दिल्ली के रामलीला मैदान में एक जनसभा के दौरान जब मंच से राहुल ने यह दहाड़ लगाई थी, तो संभवतः उन्होंने कांग्रेस का नया एजेंडा तय कर दिया था, जिसमें बीजेपी के 'हिन्दुत्व' की कोई जगह नहीं थी। इसीलिए सावरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को कांग्रेस देशद्रोही साबित करने में लगी है। पहले राहुल ने कहा कि वह राहुल सावरकर नहीं हैं। उसके बाद तो कांग्रेस का हर छोटा−बड़ा नेता सावरकर को गद्दार साबित करने में लग गया। हद तो तब हो गई जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस सेवादल के प्रशिक्षण शिविर में सावरकर के खिलाफ लिखी गई किताब ही बांट दी गई। इस किताब का जिक्र किया जाए तो इसमें लिखा गया है कि सावरकर ने अंग्रेजों से न केवल मांफी मांगी थी, बल्कि उनसे पैसे तक लिए थे। किताब में महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को लेकर भी कई टिप्पणियां हैं। इस किताब पर आरएसएस व भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। इस पर हंगामा खड़ा हुआ, तो लगा कांग्रेस बैकफुट पर आ जाएगी, परंतु अब कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी उक्त किताब बांटने की बात कह रही है। प्रयागराज में तीन फरवरी से होने जा रहे प्रदेश सेवादल के विशेष प्रशिक्षण शिविर में इस किताब का वितरण होगा।

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बता दें कि भारतीय जनता पार्टी जिस वीर सावरकर को आजादी का सिपाही मानती है, उस पर कांग्रेस यह कहते हुए बार−बार हमलावर होती रहती है कि काला पानी में कैद से छुटकारा पाने के लिए सावरकर ने अंग्रेजों को पत्र लिखकर माफी मांगते हुए गोरी हुकूमत के सामने घुटने टेक दिए थे, जबकि भाजपा और शिवसेना (जिसके साथ महाराष्ट्र में कांग्रेस सत्ता की भागीदार बनी हुई है) सावरकर को स्वतंत्रता संग्राम का नायक मानती हैं। इसकी वजह है वीर सावरकर का दस वर्षों तक काला पानी में सजा पाना। भाजपा और शिवसेना, कांग्रेस से इतर सावरकर के ब्रिटिश हुकूमत से माफी मांगते वाली बात तो स्वीकार करती हैं, परंतु वह उसे सावरकर की रणनीति का हिस्सा मानती हैं।

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बहरहाल, चाहे सावरकर हों या फिर मानवाधिकार आयोग जाकर राहुल−प्रियंका का योगी सरकार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना, यह बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस हिन्दुत्व के सहारे अब आगे नहीं बढ़ेगी बल्कि उसका फोकस मुसलमान और किसान पर रहेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भले अभी करीब ढाई साल बाकी हों, लेकिन कांग्रेस अभी से हाथ−पैर मार रही है। कांग्रेस ही नहीं बसपा और सपा के 'रणबांकुरे' भी सियासी बिसात बिछाने में किसी से पीछे नहीं हैं। इस सियासी जंग में एक तरफ भारतीय जनता पार्टी तो दूसरी ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी खड़ी हैं। सबकी अपनी−अपनी चाहत, अपना−अपना वोट बैंक है, जिसको किसी भी तरह यह दल सहेजे रखना चाहते हैं। मायावती को दलितों पर, समाजवादी पार्टी को यादव−मुस्लिम, भाजपा को ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर और अन्य हिन्दू वोटरों पर भरोसा है तो आजादी के बाद सबसे लम्बे समय तक प्रदेश में राज करने वाली कांग्रेस का दिसंबर 1989 से प्रदेश में जो पतन शुरू हुआ,उससे वह आज तक उबर नहीं पाई है। लगातार कांग्रेस का जनाधार घटता जा रहा है। जिस गांधी परिवार का उत्तर प्रदेश में डंका बजा करता था, जिसने अपने गृह राज्य यूपी से देश को एक या दो नहीं तीन−तीन प्रधानमंत्री सिर्फ गांधी परिवार से ही दिए हों, वह कांग्रेस अपने गृह राज्य यूपी में गर्दिश में समाई हो तो दुख और आश्चर्य दोनों होता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सब के सब यूपी में पिटे मोहरे नजर आ रहे हैं। 

-अजय कुमार

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