संघ, हिंदुत्व व सनातन पर सुनियोजित हमले

By मृत्युंजय दीक्षित | Jun 24, 2026

बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम देखने के बाद संघ, हिंदू तथा सनातन विरोधी ताकतें पुनः पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय हो गयी हैं। जिन जिन राज्यों में विरोधी दलों की सरकारें हैं, उन-उन राज्यों संघ, हिंदुत्व व सनातन के विरुद्ध षड्यंत्र प्रारंभ हो गए हैं।  

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 वर्ष पुराना सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। यदि केरल के तीन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने संघ की किसी व्याख्यान माला, बौद्धिक चर्चा या सार्वजनिक कार्यक्रम में श्रोता के रूप में भाग ले लिया तो इसे अपराध या पद की गरिमा के विरुद्ध कैसे माना जा सकता है? इसके लिए उन्हें माफी मांगने को क्यों कहा जा रहा है? जब कुलपति वामपंथी विचारकों, गांधीवादी या अम्बेडकरवादी कार्यक्रमों में भाग लेते हैं या अन्य सामाजिक संगठनों के कार्यक्रम में भाग लेते हैं तो उसे "बौद्धिक संवाद" कहा जाता है किन्तु यदि वही कुलपति संघ प्रमुख का व्याख्यान सुन ले तो उससे माफी मांगने को कहा जाता है। यह दोहरा मापदंड है।

विश्वविद्यालय ज्ञान, संवाद और विचार-विमर्श के केंद्र होते हैं, वैचारिक बहिष्कार के नहीं। यदि किसी कुलपति ने मंच से कोई राजनीतिक घोषणा नहीं की, किसी दल का प्रचार नहीं किया, किसी प्रशासनिक निर्णय को प्रभावित नहीं किया, वरन मात्र एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लिया, तो उसे "संघ कार्यकर्ता के स्तर तक गिर जाना" कहना उच्च शिक्षा संस्थानों और कुलपति की गरिमा का अपमान है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन विचारों से असहमति और व्यक्तियों के बहिष्कार में अंतर होता है। यदि संघ से वैचारिक मतभेद हैं, तो उसका उत्तर विचार से दिया जाना चाहिए, न कि लोगों को कार्यक्रम में जाने से रोककर प्रताड़ित करके। विडंबना यह है कि जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक बहुलता की बात करते हैं, वही आज यह तय करना चाहते हैं कि कुलपति किसका व्याख्यान सुन सकते हैं और किसका नहीं। क्या भारत में अब किसी शिक्षाविद् को कोई व्याख्यान सुनने के लिए राजनीतिक अनुमति लेनी होगी?

सर्वविदित है कि संघ सौ साल से काम कर रहा है। सब जानते हैं कि संघ क्या करता है। जो सोया है उसे जगाया जा सकता है जो सोने का नाटक करता है उसे नहीं जगाया जा सकता है। संघ की समाज में निश्चित छवि है। संघ अपनी छवि सुधारने के लिए नहीं अपितु समाज के हित में काम करता है। आरोपों का उत्तर देने में संघ समय नहीं व्यर्थ करता है। संघ के स्वयंसेवक समाज में काम करते हैं। संघ बढ़ रहा है तो हर जगह दिख रहा है। संघ की छवि बिगाड़ने वालों का प्रयास करने वालों की अपनी कोई विश्वसनीयता नहीं है। समाज के हर वर्ग के लोग संघ को प्रेम दे रहे हैं। संघ के काम को समाज आशीर्वाद देता है। 

वर्तमान कांग्रेस जो आज संघ व भाजपा पर प्रतिबंध लगाने का सपना देख रही है उसको ध्यान रखना चाहिए कि यही काम नेहरू जी से लेकर इंदिरा जी और सोनिया जी तक करने का प्रयास करती रही हैं। प्रियांक जैसा दुस्साहस नेहरू जी ने किया था। वो अपने पत्रों में संघ को खतरा बताते थे और जिन्ना की मुस्लिम लीग को क्लीन चिट देते थे। कांग्रेस की मुस्लिम लीग के प्रति मोहब्बत की यह दुकान केरल में केरल में आज भी चल रही है। केरल के सीएम नाराज हैं कि तीन कुलपति संघ के कार्यक्रम में चले गए थे। इसी प्रकार एक बार नेहरू जी सर्वपल्ली राधाकृष्णन से नाराज हो गए थे क्योकि वह संघ की शाखा में चले गए थे। उस समय नेहरू जी के लिए संघ, पाकिस्तान से भी खतरनाक था। 

नेहरू तो गांधी की हत्या के पहले से ही संघ के खिलाफ योजना बना रहे थे। गाँधी की हत्या हुई तो अवसर मिल गया और प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन उसके विरुद्ध साबित कुछ नहीं हुआ। कांग्रेसी आज तक संघ को समाप्त करने का सपना देख रहे हैं और संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। इनके नेताओं के मन में संघ, भाजपा व हिंदुत्व के प्रति जो घृणा है उसका मूल कारण यही है कि आज संघ व हिंदुत्व सर्वव्यापी हो चुका है। अगर हिंदू समाज का अपमान होता है तो वह उसका करारा जवाब देना सीख गया है। संघ के शताब्दी वर्ष में भाजपा व उसके सहयोगी दलों की विजय यात्रा 22 राज्यों तक पहुंच चुकी है। केरल में भी संघ का विस्तार हो रहा है और यही कारण है कि वी डी सतीशन को संघ से डर लग रहा है। 

- मृत्युंजय दीक्षित 

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