मूर्खों के देश में कोरोना काल

By पीयूष पांडे | Mar 31, 2020

मूर्ख और अक्लमंद में कौन बड़ा है? इस सवाल का जवाब देने के लिए ज्यादा अक्ल की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जवाब है मूर्ख बड़ा है। ऐसा नहीं होता तो पूरी दुनिया में मूर्ख दिवस नहीं मनाया जाता। आप स्वयं सोचिए कि आखिर अक्लमंदों की अक्लमंदी को मान्यता देने के लिए कोई दिवस क्यों नहीं है? क्या अक्लमंद नहीं चाहते कि उन्हें भी सम्मानित किया जाए? उनकी अक्लमंदी को सलाम करने के लिए भी एक दिन आरक्षित हो? निश्चित रुप से चाहते होंगे लेकिन मूर्खों के सामने कौन टिका है भला? मूर्खों के विषय में आदिकाल से इतना कुछ लिखा जा चुका है कि कोई भी सो कॉल्ड अक्लमंद उनके विषय में नया कुछ नहीं लिख सकता। इसलिए कृपया मुझसे कुछ नए की उम्मीद ना करें।


विद्वानों ने मूर्खता के विषय में सबसे अनूठी बात यह बताई है कि यह कर्म की थ्योरी को खारिज करती है। आप कितना भी कर्म कर लें लेकिन मूर्खत्व को प्राप्त नहीं कर सकते। आप मेहनत करके आईएएस-पीसीएस बन सकते हैं, लेकिन मेहनत करके मूर्ख नहीं बन सकते। मूर्खता नैसर्गिक होती है। मूर्खता पूजा-अर्चना, ध्यान वगैरह से भी नहीं पाई जा सकती। लेकिन, कोरोना काल में मुझे मूर्खों के विषय में प्रतिपादित यह आदिकालीन सिद्धांत कुछ हद तक गलत दिख रहा है। क्योंकि जिस तरह जंगल में बंदर एक डाली से दूसरी डाली पर उछलते हैं, वैसे ही देश में हजारों लोग कोरोना के संदिग्ध होते हुए भी जानते बूझते इधर से उधर उछल रहे हैं। कई संक्रमित पहली ही बार में मूर्खता का 'नोवेल' अवॉर्ड झटकने के चक्कर में क्वारंटाइन की मुहर मिटाकर भाग रहे हैं। पारंपरिक मूर्ख भी जान संकट में होने पर चुपचार घर में दुबक जाते हैं लेकिन ये मूर्ख इलाज कराने के बजाय 'जॉम्बीज' बनना पसंद कर रहे हैं। 

 

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कोरोना वायरस भी ऐसे मूर्खों को देखकर कई बार सोचता होगा- "गुरु कैसे मूर्खों के पास आ गया हूं, जिन्हें अपनी जान की चिंता तो नहीं ही है, अपने परिवार-दोस्तों और आसपास के लोगों की भी चिंता नहीं है।" कोरोना काल में ही मूर्खों की एक और कैटेगरी दिखायी दी, जो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से मिले ज्ञान को बिना देखे खुद पर आजमाते हुए अस्पताल के चक्कर लगा रही है।  


एक पिद्दी से कोरोना के चक्कर में अक्लमंदों का नकाब ओढ़े कई मूर्खों की मुश्किल इतनी बढ़ गई है कि घर टूटने को हैं। ये मूर्ख बीबी से बैंगलोर-तिरुपति वगैरह का झूठ बोलकर बैंकॉक-पटाया में मौज मस्ती करके लौटे थे। कानून के हाथ भले लंबे हो ना हों, लेकिन कोरोना के हाथ बहुत लंबे निकले। विदेश से लौटते ही ऐसे कई झूठे पतियों के घर की दीवार पर पुलिस ने क्वरंटाइन रहने के पोस्टर चिपकाए तो झूठ के साथ पूरे मुहल्ले में इनकी मूर्खता का भी पर्दाफाश हो गया।

 

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जिस तरह कोरोना का संक्रमण फैल रहा है, हद ये कि उसी तरह कोरोना को मजाक समझने वाले मूर्ख भी मूर्खता का संक्रमण फैला रहे हैं। मूर्ख दिवस पर इन मूर्खों से हाथ जोड़कर विनती है कि भइया मूर्खता के लिए उम्र पड़ी है, अभी जिंदा रहने लायक थोड़ी अक्लमंदी कर लो।


- पीयूष पांडे

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