कोरोना ने कम किया पढ़ाई का रोना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 05, 2020

कोरोना, संस्थाओं को अच्छे निर्णय लेने के लिए भी प्रेरित कर रहा है जिसके कारण आत्मनिर्भरता में बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि देश के होनहार विद्यार्थियों के लिए नई शिक्षा नीति कुछ ही दिनों में सक्रिय होने वाली है लेकिन उससे पहले स्थापित शैक्षिक परीक्षा नियंत्रक संस्था ने अपने सिलेबस से तीस प्रतिशत पढ़ाई हटा दी है। विद्यार्थी बहुत आराम महसूस कर रहे हैं। कई बरसों से सोच रहा था कि जिन बच्चों ने बड़े होकर रोटी, कपड़ा और मकान के लिए मारामारी करनी है उनके लिए फ़ालतू विषय पढ़ाना बिलकुल उचित नहीं है। अभिभावकों के लिए भी सिरदर्दी थी, पढ़ाने के लिए बढ़िया स्कूल खोजने, दाखिले और फिर सौ प्रतिशत अंक हासिल करने के लिए चौबीस घंटे प्रतियोगिता के कंटीले मैदान में बच्चों के साथ भागना। नवीं, दसवीं व ग्यारहवीं कक्षा में विद्यार्थी को यह तय कराया जाता है कि उसने जीवन में पैसा किस रास्ते चलकर कमाना है इसलिए पता नहीं आज तक फ़ालतू पढाई क्यूं कराई जाती रही। बच्चों के लिए मोबाइल, व्ह्त्सेप, वीडियो गेम के साथ मातापिता के ख़्वाबों को ढोने के लिए इतना पढना मुश्किल हो चला था। देश के प्रसिद्द अनुभवी शिक्षा नीति विशेषज्ञ, शैक्षिक ढांचा बदलने को सिस्टम को चेताते रहते थे लेकिन यह कोरोना युग में ही होना था, हुआ। 

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वैसे भी विद्यार्थियों ने पढ़ा कुछ और होता है, पसंद या नापसंद का व्यवसायिक कोर्स करने के बावजूद  नौकरी करने के लिए स्टेपनी की तरह तैयार रहना पड़ता है। उन्हें वह काम करना पड़ता है जिसकी पढ़ाई नहीं की होती। शुक है पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों वाला चैप्टर हटा दिया, उपनिवेशवाद, नोटबंदी और जीएसटी जैसा, कुछ राजनीतिज्ञों को छोड़ अधिकांश लोगों को अभी तक समझ न आने वाला अध्याय खिसका   दिया। यह सब ज़िंदगी के धंधे में आने के बाद खुद समझ आ जाता है, पढने की ज़रूरत नहीं। आजकल बुजुर्गों की कही बातें सराही जा रही हैं, कहा जा रहा है पढाई लिखाई के साथ समझदारी का कोई ताल्लुक नहीं है। हैरानी है विश्वगुरु के गुरुकुल के चेलों को अभी तक पता नहीं था कि नवप्रतिभाओं को निखारने के लिए कौन कौन से स्वादिष्ट घोटे पिलाए जाने चाहिए। देखोजी, कुछ भी हो, अच्छा काम दुश्मन भी करे तो खुले दिल से तारीफ़ करने में क्या हर्ज़ है। कोरोनाजी ने ही शैक्षिक संस्था को यह वैक्सीन ढूंढ कर दी है।

- संतोष उत्सुक

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