By अभिनय आकाश | Sep 24, 2026
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि मोटर दुर्घटना के मामले में अपील सुनने वाली अदालत मुआवज़े की रकम बढ़ा सकती है, भले ही पीड़ितों या उन पर निर्भर लोगों ने अलग से कोई अपील या क्रॉस-ऑब्जेक्शन न किया हो; बशर्ते बीमा कंपनी ने तय की गई मुआवज़े की रकम को चुनौती दी हो। कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है और अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ितों और उन पर निर्भर लोगों को कानून के मुताबिक उचित और सही मुआवज़ा मिले। लखनऊ बेंच के जस्टिस प्रशांत कुमार ने फ़ैज़ाबाद मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। बीमा कंपनी की अपील को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने सभाजीत तडमाली के परिवार के लिए मुआवज़े की रक़म 7.20 लाख रुपये से बढ़ाकर 11,43,565 रुपये कर दी और सालाना ब्याज दर को 7 प्रतिशत पर ही बनाए रखा। यह मामला 16 नवंबर 2017 को हुए एक हादसे से जुड़ा है, जब ताडमाली अंबेडकर नगर में पैदल चल रहे थे। एक SUV ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनके परिवार ने 49.70 लाख रुपये के मुआवज़े की मांग की थी। बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दुर्घटना से पहले ही गाड़ी चोरी हो गई थी और उस समय वह गाड़ी के मालिक या ड्राइवर के पास नहीं थी। कंपनी ने ड्राइवर की पहचान पर भी सवाल उठाए और चार्जशीट तथा ड्राइविंग लाइसेंस के रिकॉर्ड में उसके नाम में अंतर की ओर इशारा किया।
हाई कोर्ट ने मृतक की मासिक आय को भी ट्रिब्यूनल द्वारा तय 5,000 रुपये से बढ़ाकर 7,400.46 रुपये कर दिया, जो अकुशल श्रमिक के लिए न्यूनतम मजदूरी के बराबर है। इसके अलावा, कोर्ट ने मृतक की पत्नी और दो बच्चों में से प्रत्येक को 48,400 रुपये का 'कंसोर्टियम' (पारिवारिक नुकसान के लिए मुआवजा) भी दिया। कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना पीड़ितों और उन पर निर्भर लोगों को उचित मुआवजा दिलाने में तकनीकी बातें बाधा नहीं बननी चाहिए।