घर छोड़ने पर तलाक के बाद भी महिला Maintenance की हकदार : Allahabad High Court

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि घर छोड़ने के आधार पर हुए तलाक के बाद भी महिला अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, बशर्ते उसने पुनर्विवाह न किया हो और वह भरण-पोषण में असमर्थ हो। अदालत ने सुलतानपुर परिवार अदालत के आदेश को रद्द करते हुए मामले पर पुनर्विचार करने और महिला को चार हजार रुपये मासिक अंतरिम भत्ता देने का निर्देश दिया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि घर छोड़ने के आधार पर हुए तलाक के मामले में भी महिला अपने पूर्व पति से गुज़ारा भत्ता मांग सकती है, बशर्ते उसने दोबारा शादी न की हो और वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ हो। न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र ने सुनीता नामक महिला द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को मंजूरी देते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में सुलतानपुर परिवार अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें उसके गुजारा भत्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था।
सुनीता ने 2009 में अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता का मामला दायर किया था। उसने अपने पति और ससुराल के लोगों पर अतिरिक्त दहेज के लिए परेशान करने का आरोप लगाते हुए दावा किया था कि वे दहेज में एक लाख रुपये, एक मोटरसाइकिल और एक रंगीन टेलीविजन की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित कर रहे हैं। हालांकि, सुनीता के पति ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी उसके साथ रहना नहीं चाहती थी इसीलिए उसने उसे छोड़ दिया था।
मामले में इस कार्यवाही के दौरान पति ने 25 सितंबर 2014 को घर छोड़ने के आधार पर एकतरफा विवाह विच्छेद का आदेश हासिल कर लिया था, जिसमें उच्च न्यायालय ने ऐसे सुबूत भी देखे जिनसे पता चला कि उसने बाद में दूसरी शादी कर ली थी और उसके सर्विस रिकॉर्ड में दूसरी महिला का नाम उसकी पत्नी के तौर पर दर्ज था। आदेश के अनुसार पीठ ने कहा कि अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगने के सीमित मकसद के लिए तलाकशुदा महिला को पत्नी ही माना जाता है। केवल इस बात से कि विवाह विच्छेद घर छोड़ने के आधार पर हुआ था, उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि तलाकशुदा महिला तब तक गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, जब तक वह दोबारा शादी नहीं कर लेती या अपनी कमाई से अपना खर्च उठाने (लागू कानूनी शर्तों के अधीन) में सक्षम नहीं हो जाती। उच्च न्यायालय ने माना कि परिवार अदालत ने सुनीता के दावे को पूरी तरह खारिज करके गलती की थी। अदालत ने कहा कि विवाह विच्छेद से पहले की अवधि के लिए उसके हक की अलग से जांच की जानी चाहिए, लेकिन परिवार अदालत को निर्देश दिया कि वह 25 सितंबर 2014 (विवाह विच्छेद की तारीख) से उसके दावे पर फिर से विचार करे।
मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए परिवार अदालत को वापस भेज दिया गया। उच्च न्यायालय ने मामले पर नए सिरे से सुनवाई होने तक पति को निर्देश दिया कि वह सुनीता को अंतरिम भरण-पोषण के तौर पर हर महीने चार हजार रुपये दे।
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