राजस्थान में भाजपा को जिस तरह सीपी जोशी नई ऊर्जा दे रहे हैं उससे कांग्रेस का भयभीत होना स्वाभाविक है

By निरंजन परिहार | May 09, 2023

सीपी जोशी ने रफ्तार पकड़ ली है। अध्यक्षीय आह्वान मिलते ही चुनावी मुद्राएं अर्जित कर ली हैं। दिन भर की थकान और रातों की नींद भूल गए हैं। बीजेपी की ऐतिहासिक जीत का जज्बा जुटाकर लगातार दौरों पर हैं। नेताओं को नेतृत्व क्षमता संवार रहे हैं और कार्यकर्ताओं की कमर कस रहे हैं। महज सवा महीने में ही जोशी की राजनीतिक कोशिशों ने यह साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री के पहरुए के रूप में ग्राउंड जीरो पर अपनी मुश्कें कसकर कैसे डटकर काम करना होता है। चुनाव सर पर हैं और राजस्थान में बीजेपी के अध्यक्ष के तौर पर भले ही सीपी जोशी नए हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक अदाएं अपने से पहले वाले अध्यक्षों के मुकाबले उन्हें ज्यादा अनुभवी और तेजतर्रार दिखा कर रही हैं।

प्रधानमंत्री मोदी से शक्ति संचार पाते ही जोशी के भाषण दमदार लगने लगे हैं, प्रदेश से लेकर जिलों तक की राजनीतिक गांठों को खंगालने व खोलने का काम शुरू हो गया है और दौरे लगातार जारी है। सवा महीने में सवा लाख से भी ज्यादा लोगों से व्यक्तिगत तौर पर चुनाव में सक्रियता के साथ जुड़कर कमल खिलाने का वादा ले चुके हैं और ऐतिहासिक जीत का झंडा गाड़ने का वचन भी। संदेश साफ है कि जोशी केंद्रीय नेतृत्व के प्रतिनिधि हैं और उनके हर कदम से कदम मिलाकर चलने में ही सबकी भलाई है। लगभग सभी मान रहे हैं और जान भी रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोशी में कुछ तो जरूर देखा, इसीलिए अपने प्रतिनिधि के तौर पर राजस्थान में बीजेपी की कमान उन्हें सौंपी। लोग नहीं जानते कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें किस भरोसे से अध्यक्ष बनाया। यह भी कोई नहीं जानता कि अमित शाह ने उन्हें कितनी सीटें जिताने का लक्ष्य सौंपा है, और इस बात की भी किसी को कोई खबर नहीं कि पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उनको कितना क्षमता संपन्न करके भेजा है। लेकिन केंद्र के आशीर्वाद के साथ जीत का जलवा दिखाने में जुट गए जोशी की चुनावी मुद्राओं से लग रहा है कि वे अपने लक्ष्य को समर्पित हैं और अपने राजनीतिक आकाओं के विश्वास पर न केवल खरे उतरेंगे, बल्कि उस विश्वास को और अगले शिखर पर भी ले जाएंगे।

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कुछ दिन पहले तक समूचे राजस्थान के लिए सीपी जोशी की राजनीतिक अहमियत महज चित्तौड़गढ़ के सांसद के तौर पर थी। लेकिन बीजेपी के कई बड़े नेता भी मोदी की इस पसंद को राजस्थान की राजनीति के छुपे रुस्तम के रूप में देखने लगे हैं। दरअसल, राजस्थान में बीजेपी की राजनीति में सीपी जोशी पहले राजनेता हैं, जो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आशीर्वाद से अध्यक्ष पद पर काम करने आए हैं। जोशी से पहले चाहे भैरोंसिंह शेखावत हो या वसुंधरा राजे और या फिर ओम प्रकाश माथुर या अरुण चतुर्वेदी और सतीश पूनिया या फिर कोई और, सारे के सारे राजस्थान में अपनी राजनीति के बूते पर अध्यक्ष के पद पर पहुंचे। लेकिन सीपी जोशी पहले अध्यक्ष हैं, जो केंद्रीय नेतृत्व के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली से राजस्थान पहुंचे हैं। अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर की राजनीति के पचड़े में वे कभी पड़े नहीं। इसी कारण नियुक्ति हुई, तो जोशी की अध्यक्षीय क्षमता पर किसी को शंका, किसी को आशंका तो किसी को कुशंका भी रही। लेकिन केवल महीने भर में ही अपनी क्षमताओं के आकाश को विस्तार देकर जोशी ने चुनावी कौशल, रणनीतिक सूझबूझ और राजनीतिक पराक्रम की पटकथा में कुछ नए पन्ने जोड़ने शुरू कर दिए हैं।

       

जोशी जान रहे हैं कि अब वे सिर्फ चित्तौड़गढ़ के सरल स्वभावी सांसद नहीं, बल्कि प्रदेश की सत्ता में धमक के साथ आ रहे संसार के सबसे बड़े राजनीतिक दल के मुखिया हैं। वे यह भी जानते हैं कि अलग अलग किस्म के अनेक सामाजिक समीकरणों को सुलझाने के लिए कुछ खास तेवर, कोई नई-सी ताकत और विशिष्ट किस्म की आक्रामकता भी चाहिए। इसीलिए केवल सवा महीने में ही जोशी कईयों को बदले बदले से नजर आने लगे हैं। उनकी कार्यशैली में वे मजबूत राजनीतिक मुद्राएं झलकने लगी हैं, और उनकी उपस्थिति में अध्यक्षीय आचरण का आभामंडल भी साफ दिखाई दे रहा है। जोशी जानते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व के विश्वास से सज्ज अध्यक्ष के रूप में किसको कितना महत्व देना है, किससे निभाना है, और किससे निबटना है। बीजेपी की अंदरूनी राजनीतिक चुनौतियों का उनको आभास है और प्रदेश के भौगोलिक और जातिगत समीकरणों की उलझनों की भी समझ उनमें साफ दिख रही है। इन सबसे पार पाने की ताकत जोशी ने मोदी, शाह और नड्डा से अर्जित कर ही ली है। इसीलिए, अध्यक्षीय धमक और राजनीतिक चमक के साथ प्रदेश को नापने और हालात को भांपने के साथ ही जोशी ने बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाने की कमर कस ली है। कमर तो खैर, उधर सरकार में बैठी कांग्रेस भी गुलाबी अंदाज में कस रही हैं, लेकिन जोशी के जज्बे में जीत का जो जलवा झलक रहा है, वह अगर किसी को साफ नहीं दिख रहा, तो वे अपनी नेत्र चिकित्सा कराने को स्वतंत्र हैं!

-निरंजन परिहार

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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