गांवों की खुशहाली मापने के लिए बनाएं नए मानदंड

By उमेश चतुर्वेदी | Jan 28, 2025

दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था वाले अपने देश की पहचान उसके गांव रहे हैं। देश सिर्फ ग्रामीण संस्कृति और कृषि व्यवस्था के लिए ही नहीं, सहकार और शिल्पकारी के लिए भी वैश्विक पहचान रखते रहे हैं। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले दौर में भी भारतीय कृषि और आर्थिकी के आधार गांव ही रहे। यह बात और है कि अंग्रेजी शासन के दौरान से भारतीय गांवों का पतन शुरू हुआ। इसके बाद भारतीय गांव गरीबी और मजबूरी के पर्याय माने जाने लगे। लेकिन घरेलू उपयोग और खर्च के ताजा सर्वेक्षण की रिपोर्ट बता रही है कि गांवों की आर्थिक तस्वीर बदलने लगी है।

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2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 68 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, जबकि 32 प्रतिशत आबादी शहरों में है। स्वाधीन भारत में विशेषकर उदारीकरण के बाद जिस तरह का विकास मॉडल हमने अपनाया, उसमें शहरी विकास पर सबसे ज्यादा फोकस रहा, ग्रामीण विकास या तो रस्मी रहा या फिर उस पर फोकस शहरों की तुलना में कम रहा। शहरों की ओर रोजगार और जीवन सुविधाएं केंद्रित होती चली गईं। शिक्षा के भी बेहतर अवसर गांवों की तुलना में शहरों की ओर बढ़ते गए। इस लिहाज से ग्रामीण क्षेत्रों से सबसे ज्यादा पलायन रोजगार और शिक्षा के लिए हुआ। फिर जिन परिवारों के पास सहूलियतें बढ़ीं, उन परिवारों ने अपनी हैसियत और बजट के लिहाज से मुफीद पाए जाने वाले शहरों की ओर रहने के लिए रूख किया। यही वजह है कि शहरी और ग्रामीण आबादी का जो अनुपात आबादी के समय था, वह आज बदल चुका है। आजादी के वक्त तकरीबन 80 फीसद से ज्यादा लोग गांवों में रहते थे, अनुमान है कि वह घटते-घटते अब साठ और पैंसठ फीसद के बीच आ गई है। रिकॉर्ड पर ग्रामीण आबादी का इतना बड़ा हिस्सा भले ही गांवों में बसता हो, लेकिन हकीकत यह है कि इसमें एक बड़ा हिस्सा शहरों में रोजी-रोटी और शिक्षा के लिए कभी शौकिया तो कभी मजबूरीवश रहने को मजबूर है। इसलिए रिकॉर्ड की तुलना में वास्तविक ग्रामीण आबादी अब और भी कम हो चुकी है। 

घरेलू खर्च के इस नए आंकड़े को देखते वक्त हमें इस संदर्भ पर भी ध्यान देना होगा। बहरहाल हमें यह भी ध्यान देना होगा कि ग्रामीण इलाकों में खाद्यान्न विशेषकर गेहूं और चावल पर खर्च में निजी या पारिवारिक खर्च में कमी आई है। इसकी वजह यह है कि सरकार की ओर से तमाम तरह की योजनाएं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रम चल रहे हैं। मुफ्त खाद्यान्न योजना समेत कई अन्य सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के जरिये मुफ्त में मिल रही चीजों की कीमतों को ध्यान में रखें तो घरेलू खर्च के ये आंकड़े ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए क्रमशः 4,247 रुपये और 7,078 रुपये हो जाते हैं। मौजूदा कीमतों के संदर्भ में  देखें तो शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति खर्च पर औसत आठ और नौ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।  साल 2011-12 में शहरी और खपत खर्च के बीच 84 प्रतिशत का अंतर था, जो  2022-23 में घटकर 71 प्रतिशत हो गया। जो अब 70 फीसद ही रह गया है। इन आंकड़ों से ग्रामीण इलाकों में बढ़ती खुशहाली की तसवीर सामने आती है। दिलचस्प यह है कि इस आंकड़े में खाने-पीने के अलावा की चीजों पर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च 60 और 53 प्रतिशत रहा। इसका मतलब साफ है कि अब ग्रामीण इलाकों में भी वाहन, कपड़े, बिस्तर, जूते, मनोरंजन एवं टिकाऊ आदि सामानों पर खर्च बढ़ा है। इससे साफ है कि उपभोक्तावाद ने ग्रामीण इलाकों पर भी जोरदार दस्तक दी है। वैसे ऑनलाइन स्टोर से गांवों में खरीददारी बढ़ी है और उनके डिलीवरी एजेंटों की बाइकें अब ग्रामीण इलाकों का भी खूब चक्कर लगा रही हैं।

पिछले साल मई में रिजर्व बैंक ने भी ग्रामीण इलाकों में बढ़ती खपत खर्च को लेकर ऐसे ही आंकड़े जारी किए थे। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने उम्मीद जताई थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी रहेगी और देश की जीडीपी दर मे 7.3 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो सकती है। लेकिन रिजर्व बैंक ने इसी रिपोर्ट में ग्रामीण इलाकों में बढ़ते कर्ज को लेकर भी रिपोर्ट जारी की थी। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कर्ज को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इसके मुताबिक, कर्ज लेने में ग्रामीण क्षेत्रों के लोग कहीं ज्यादा आगे हैं। गांवों में प्रति एक लाख लोगों में 18,714 लोग ऐसे हैं, जिन्होंने कोई न कोई कर्ज ले रखा है, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 17,442 प्रति लाख ही है। साफ है कि उपभोक्तावाद ग्रामीण संस्कृति को बदलने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। कर्ज कभी गांवों के लोगों के लिए सिरदर्द होते थे, इसलिए वहां बचत केंद्रित आर्थिकी पर जोर था। लेकिन अब इसमें गिरावट आई है। इसका मतलब साफ है कि गांवों में खर्च भले ही बढ़ रहा है, लेकिन यह भी सच है कि गांवों की तसवीर अभी कम से कम वैसी नहीं हो पाई है, जिस स्तर पर शहरी तसवीर है। 

गांवों का समृद्ध होना जरूरी है। हाल के दिनों में जनसंख्या को बढ़ाने और न बढ़ाने को लेकर सियासी तौर पर अपने-अपने तर्क दिए जा रहे हैं। इन तर्कों के अपने आधार हो सकते हैं। लेकिन इससे शायद ही कोई इनकार करेगा कि भारत के शहरों की सांस अगर फूल रही है तो इसकी बड़ी वजह उनकी ओर बेतहाशा हो रहा पलायन और उस बड़ी जनसंख्या के लिए इस्तेमाल हो रहे उपभोक्ता वस्तुओं का बड़ा योगदान है। भारत में आबादी बढ़ाने की जगह आबादी के समन्वित और संतुलित वितरण की जरूरत ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में आबादी को रोकने की कोशिश होनी चाहिए। ग्रामीण आबादी को बुनियादी शिक्षा और रोजगार गांवों या उसके आसपास ही उपलब्ध कराने की नीतियों पर आगे बढ़ना चाहिए। अगर ऐसा होगा तो निश्चित तौर पर आबादी को संतुलित किया जा सकेगा। तब गांव आबादी विहीन नहीं होंगे और शहरों पर आबादी का असंतुलित बोझ नहीं बढ़ेगा। 

गांवों में हो रही खपत और खर्च को लेकर आ रहे आंकड़ों का पहला असर यही होना चाहिए कि गांवों में आबादी रूके। लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। ग्रामीण इलाके में बढ़ते खर्च से अव्वल तो गांवों में रोजगार के साधन बढ़ने चाहिए। लेकिन इस दिशा में ठोस बदलाव होते नजर नहीं आ रहे।

बेशक आज आजादी के बाद के दौर की तरह के बदहाल गांव नहीं हैं। बेशक शहरों जितना उसे बिजली नहीं मिलती, लेकिन पहले की तुलना में अब गांवों को भी बिजली ज्यादा मिल रही है। गांवों में भी उपभोक्ता वस्तुएं पहुंची हैं। इससे बेशक पारंपरिक संस्कृति चोट भले ही पहुंची हो। यह भी सच है कि ग्रामीण विकास और दूसरी कल्याण योजनाओं के जरिए गांवों में केंद्रीय और राज्य सरकारों की ओर से पैसा जा रहा है। लेकिन यह भी सच है कि उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा जमीनी स्तर पर खर्च होने की बजाय नौकरशाही और राजनीतिक रिश्वत के रूप में शहरी इलाकों में ही रूक रहा है और वहीं निवेशित हो रहा है। इस लिहाज से देखें तो ग्रामीण इलाके में जैसी समृद्धि दिखनी चाहिए, कम से कम जमीनी स्तर पर वैसी समृद्धि नहीं है। गांवों का जैसा रूप होना चाहिए, वैसा नहीं है। इसलिए सिर्फ घरेलू खर्च के जरिए ही गांवों की खुशहाली और समृद्धि की खोज करना उचित नहीं होगा। यह तभी होगा, जब गांवों की खुशहाली और समृद्धि मापने के लिए समन्वित और समावेशी मूल्यांकन प्रणाली अपनाएंगे, जिसमें यह भी देखा जाएगा कि कितनी ग्रामीण आबादी को मजबूरी में गांव पीछे छोड़ना पड़ा है और कितनी आबादी गांव लौट रही है। गांवों के लिए ऐसी समन्वित नीतियां तैयार करना और उन्हें लागू करना होगा, जिनके जरिए परंपरा भी बची रहे, संस्कृति की धारा भी अजस्र बनी रहे, समृद्धि भी आए और गांवों को शहरों का मोहताज नहीं होना पड़े, जैसा महात्मा गांधी चाहते थे।

उमेश चतुर्वेदी

लेखक गंवईं गंध के वरिष्ठ पत्रकार हैं...

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