क्या आप CAA के विरोधी हैं? यदि हाँ, तो इस लेख को पढ़ने के बाद मोदी मोदी के नारे लगाएंगे

By नीरज कुमार दुबे | Mar 13, 2024

संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ भ्रम फैलाने का खेल शुरू हो चुका है। कुछ लोग इस कानून पर रोक लगाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं तो कुछ लोगों ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है। कुछ विपक्षी मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि इस कानून को हम अपने राज्य में लागू नहीं करेंगे जबकि वह जानते हैं कि केंद्रीय कानून में हस्तक्षेप करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। मगर वोटों की राजनीति के लिए वह कुछ भी बोल रहे हैं। इस क्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री तो सबसे आगे निकल गये और सीएए का विरोध करते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ अमर्यादित शब्द का उपयोग करते हुए कह दिया है कि ये क्या बदतमीजी है। 

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जो लोग सीएए का विरोध कर रहे हैं क्या उनमें से एक ने भी इस कानून के नियमों को पूरी तरह से पढ़ा है? जो लोग सीएए का विरोध कर रहे हैं क्या उनमें जरा भी मानवता नहीं है? जो लोग कह रहे हैं कि इसमें पड़ोसी देशों के मुस्लिमों को क्यों नहीं शामिल किया गया क्या वह इस बात को नहीं जानते कि मुस्लिमों को इस्लामिक देश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जाता? अगर वह वहां किसी तरह परेशान भी हैं तो दुनिया में कई इस्लामिक देश हैं जहां वह बस सकते हैं। लेकिन हिंदुओं के लिए हिंदू बहुलता वाला एक ही देश भारत है जहां वह आ सकते हैं। जो लोग कह रहे हैं कि सीएए में मुस्लिमों को शामिल नहीं कर भारत के संविधान का उल्लंघन किया गया है, उन्होंने शायद गृह मंत्रालय का बयान नहीं पढ़ा है। इसके अलावा, भारत कैसे सभी धर्मों को साथ लेकर चलता है और कैसे अपने अल्पसंख्यकों का खास ख्याल रखता है, इसे आप इस बात से भी समझ सकते हैं कि भारत में अल्पसंख्यक मामलों के लिए अलग से मंत्रालय है। यही नहीं, भारत में वक्फ एक्ट के तहत मुस्लिमों के लिए अलग से भूमि अधिकार कानून है। साथ ही भारत में आर्टिकल 30 के तहत अल्पसंख्यकों के लिए विशेष धार्मिक शिक्षा अधिकार कानून है। यही नहीं भारत में एचआरसीई एक्ट के तहत मंदिरों की संपत्ति और प्रबंधन से जुड़े तमाम अधिकार राज्य सरकारों के हाथ में हैं मगर किसी अन्य धर्म से जुड़े स्थलों पर सरकार का किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं है।

लेकिन हल्ला मचाने वालों का एक ही लक्ष्य है कि झूठ इतनी बार बोलो और इतना तेज बोलो कि सच दब कर रह जाये। मगर सच दब नहीं सकता। जिसके मन में सीएए को लेकर जरा भी शक है उसे केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी बयान को पढ़ना चाहिए जिसमें कहा गया है कि नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) पर भारतीय मुसलमानों को किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस कानून का भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है जिनके पास अपने समकक्ष हिंदू भारतीय नागरिकों के समान अधिकार हैं। मंत्रालय ने सीएए के संबंध में मुसलमानों और छात्रों के एक वर्ग की आशंका को दूर करने की कोशिश करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि ‘‘इस कानून के बाद किसी भी भारतीय नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश करने के लिए नहीं कहा जाएगा।’’ गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि भारतीय मुसलमानों को किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस कानून में उनकी नागरिकता को प्रभावित करने वाला कोई प्रावधान नहीं है। बयान में कहा गया है कि नागरिकता कानून का वर्तमान 18 करोड़ भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है, जिनके पास अपने समकक्ष हिंदू भारतीय नागरिकों के समान अधिकार हैं।

हम आपको बता दें कि गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि उन तीन मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के कारण पूरी दुनिया में इस्लाम की छवि बुरी तरह खराब हुई है। हालांकि, इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म होने के नाते, कभी भी धार्मिक आधार पर घृणा, हिंसा, उत्पीड़न को बढ़ावा नहीं देता है। गृह मंत्रालय के बयान में कहा गया कि यह कानून अत्याचार के नाम पर इस्लाम की छवि खराब होने से बचाता है। कानून की आवश्यकता बताते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि भारत का अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ प्रवासियों को इन देशों में वापस भेजने के लिए कोई समझौता नहीं है। बयान में कहा गया है कि यह नागरिकता कानून अवैध प्रवासियों के निर्वासन से संबंधित नहीं है। इसलिए मुसलमानों और छात्रों सहित लोगों के एक वर्ग की चिंता अनुचित है कि सीएए मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। मंत्रालय ने कहा है कि नागरिकता अधिनियम की धारा 6, जो प्राकृतिक आधार पर नागरिकता से संबंधित है, के तहत दुनिया में कहीं से भी मुसलमानों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करने पर कोई रोक नहीं है।

बयान में कहा गया कि अन्य धर्मों वाले भारतीय नागरिकों की तरह भारतीय मुस्लिमों के लिए आजादी के बाद से उनके अधिकारों की स्वतंत्रता और अवसर को कम किए बिना, सीएए ने 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत आने वाले लोगों के उत्पीड़न की पीड़ा को कम करने तथा उनके प्रति उदार व्यवहार दिखाने के उद्देश्य से नागरिकता के लिए आवेदन की योग्यता अवधि को 11 से कम कर पांच साल कर दिया है। सीएए लाने के औचित्य पर जोर देते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि उन तीन देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के प्रति सहानुभूति दर्शाने के लिए यह कानून, भारत की उदार संस्कृति के अनुसार उनके सुखी और समृद्ध भविष्य के लिए उन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त करने का अवसर देता है। बयान में कहा गया है कि नागरिकता प्रणाली में जरूरत के अनुसार बदलाव लाने और अवैध प्रवासियों को नियंत्रित करने के लिए इस कानून की आवश्यकता थी। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह कानून किसी भी मुस्लिम को मौजूदा कानूनों के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने से नहीं रोकता है, जिसे इस्लाम के अपने तौर-तरीकों का पालन करने के लिए उन तीन इस्लामिक देशों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा हो।

बहरहाल, सीएए के क्रियान्वयन के खिलाफ असम सहित देश के कुछ हिस्सों में भले विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है लेकिन सीएए लागू किये जाने पर हिंदू-सिख शरणार्थियों में खुशी का माहौल है। पहचान मिलने की उम्मीद की खुशी में शरणार्थियों का कहना है कि यह उनके लिए पुनर्जन्म की तरह है। कई कई दशकों से भारत में रह रहे शरणार्थियों को अब उम्मीद है कि सबसे बुनियादी चीज 'पहचान' उन्हें मिलने के बाद उनके और उनके बच्चों के लिए आगे का जीवन आसान हो जायेगा। देखा जाये तो सीएए का विरोध करने की बजाय इस कानून के जरिये इतने लोगों के जीवन में खुशी लाने के लिए भारतीय संसद का शुक्रिया अदा किया जाना चाहिए।

-नीरज कुमार दुबे

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