By नीरज कुमार दुबे | May 16, 2026
भारत में सोना और चांदी की बढ़ती मांग, वैश्विक अस्थिरता और आयात पर बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार, आभूषण उद्योग और खुदरा कंपनियां अब घरों और मंदिरों में पड़े निष्क्रिय सोने को फिर से अर्थव्यवस्था में लाने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। सरकार ने 12 मई को सोना और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया। इसका उद्देश्य लगातार बढ़ रहे आयात को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की है कि वह एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने पर विचार करें ताकि देश की आर्थिक स्थिति पर अनावश्यक बोझ कम हो सके।
आभूषण उद्योग का मानना है कि यदि भारतीय घरों और मंदिरों में जमा निष्क्रिय सोने का एक हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था के माध्यम से बाजार में वापस लाया जाए, तो आयात पर निर्भरता काफी कम हो सकती है। टाइटन कंपनी के मुख्य वित्त अधिकारी अशोक सोनथालिया ने कहा कि भारत के नागरिकों और मंदिरों के पास दुनिया का सबसे बड़ा जमीन के ऊपर मौजूद स्वर्ण भंडार है। टाइटन ने लगभग 25 वर्ष पहले पुराना सोना विनिमय कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान में उसकी कुल सोना जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत इसी माध्यम से पूरा होता है।
कल्याण ज्वैलर्स ने भी “नेशन फर्स्ट गोल्ड फॉर इंडिया” पहल की घोषणा की है। कंपनी का लक्ष्य इस वित्त वर्ष में पांच टन सोना आयात कम करना है। इसके तहत पुराने सोने के विनिमय कार्यक्रम को बढ़ावा दिया जाएगा, हल्के वजन के 18 कैरेट आभूषणों को प्रोत्साहित किया जाएगा और स्वर्ण मुद्रीकरण योजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कंपनी अपने 342 स्टोरों में विशेष काउंटर स्थापित करेगी, जहां ग्राहक पारदर्शी व्यवस्था के तहत सोने को नकद में बदल सकेंगे। कंपनी के अनुसार उसके कारोबार में पुराने सोने के विनिमय की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
उधर, रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कई सुझाव दिए हैं। परिषद का कहना है कि कम कैरेट वाले आभूषणों की बिक्री बढ़ाने से सोना आयात में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। साथ ही पुराने सोने को नए आभूषणों में बदलने की संस्कृति को बढ़ावा देना भी जरूरी है। मलाबार गोल्ड एंड डायमंड्स ने भी सरकार को स्वर्ण मुद्रीकरण योजना को और प्रभावी बनाने का प्रस्ताव दिया है। कंपनी के अध्यक्ष एमपी अहमद के अनुसार भारतीय परिवारों के पास भारी मात्रा में निष्क्रिय सोना मौजूद है और यदि उसका कुछ हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था में वापस आए तो नए आयात की आवश्यकता काफी कम हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय परिवार आमतौर पर आभूषण और सोने के सिक्के खरीदकर बैंक लॉकरों में सुरक्षित रखते हैं। यह सोना लंबे समय तक निष्क्रिय रहता है जबकि इसका पुनर्चक्रण देश की अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी हो सकता है। उद्योग जगत अब 22 कैरेट की बजाय 18 और 14 कैरेट के हल्के आभूषणों को बढावा देने पर भी जोर दे रहा है। टाइटन ने हाल ही में 18 कैरेट में दुल्हन आभूषणों का नया संग्रह पेश किया है।
इधर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमतों में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल कीमतों में तेजी आई है। इसके चलते मुद्रास्फीति बढ़ने और ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम होने से सोने की कीमतों पर दबाव बना है। हाल के दिनों में सोने की कीमतों में 13 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। डॉलर मजबूत होने और अमेरिकी बांड प्रतिफल बढ़ने से निवेशकों का रुझान भी सोने से दूर हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि बढ़ती तेल कीमतों ने मुद्रास्फीति की आशंकाओं को फिर बढ़ा दिया है, जिससे बाजार में ब्याज दरों को लेकर संशय पैदा हो गया है।
इस बीच, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं। इससे भारत जैसे आयात आधारित देशों पर दोहरा दबाव बन रहा है क्योंकि देश अपनी 85 प्रतिशत से अधिक तेल जरूरतें भी विदेशों से पूरी करता है। ऐसे में सोना और तेल दोनों के बढ़ते आयात से चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि सरकार अब नागरिकों से गैर जरूरी सोना और चांदी खरीद में संयम बरतने की अपील कर रही है।
-नीरज कुमार दुबे