टीवी चैनलों पर होने वाली बहसें 'तेजाबी' होती चली जा रही हैं

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Jul 08, 2022

आजकल हमारे टीवी चैनलों और कुछ नेताओं को पता नहीं क्या हो गया है? वे ऐसे विषयों को तूल देने लगे हैं, जो देश की उन्नति और समृद्धि में कोई योगदान नहीं कर सकते। जैसे भाजपा प्रवक्ता के द्वारा पैगंबर मोहम्मद के बारे में दिया बयान और अब कनाडा में बनी फिल्म ‘काली’ को लेकर देश का कितना समय बर्बाद हो रहा है। हमारे लगभग सभी टीवी चैनल दिन भर इसी तरह के मुद्दों पर पार्टी-प्रवक्ताओं और बड़बोले सतही वक्ताओं को बुलाकर उनका दंगल दिखाते रहते हैं।

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क्या उनके प्रति सदियों से चली आ रही श्रद्धा और भक्ति की परंपरा इन चलताऊ टिप्पणियों के कारण नष्ट हो सकती है? मैं तो सोचता हूं कि बहस का जवाब बंदूक से नहीं, बहस से दिया जाना चाहिए। सभी धर्मों के महापुरुषों का व्यक्ति के रूप में पूर्ण सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन उनके व्यक्तित्वों और सिद्धांतों पर खुली बहस होनी चाहिए। यदि हमारे देश में खुली बहस पर प्रतिबंध लग गया तो यह विश्व-गुरु विश्व-चेला बनने लायक भी नहीं रहेगा। भारत तो हजारों वर्षों से ‘शास्त्रार्थों’ और खुली बहसों के लिए जाना जाता रहा है। सन्मति और सहमति के निर्माण में तर्क-वितर्क और बहस-मुबाहिसा तो चलते ही रहना चाहिए। जर्मन दार्शनिक हीगल और कार्ल मार्क्स भी वाद-प्रतिवाद और समन्वयवाद के समर्थक थे। मनुष्यों में मतभेद तो रहता ही है, बस कोशिश यह होनी चाहिए कि मनभेद न रहे।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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