Deen Dayal Upadhyay Birth Anniversary: भारतीय राजनीति के पुरोधा थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय, ऐसे रखी थी जनसंघ की नींव

By अनन्या मिश्रा | Sep 25, 2025

आज ही के दिन यानी की 25 सितंबर को भारतीय राजनीति के पुरोधा पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म हुआ था। वह साल 1953 से लेकर 1968 तक भारतीय जनसंघ से जुड़े रहे। वह एक दार्शनिक, पत्रकार और गहन चिंतक होने के अलावा समर्पित संगठनकर्ता और नेता थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय से ही पार्टी के वैचारिक मार्गदर्शक और नैतिक प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

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आरएसएस में हुए शामिल

उन्होंने पिलानी में विशेष योग्यता के साथ 12वीं की परीक्षा पास की। फिर बीए की पढ़ाई के लिए कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में एडमिशन ले लिया। साल 1937 में अपने मित्र श्री बलवंत महाशब्दे के कहने पर वह आरएसएस में शामिल हो गए।

बीए की परीक्षा पास करने के बाद वह आगरा आ गए और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में सक्रिय हो गए। संघ सेवा के दौरान पंडित दीनदयाल उपाध्याय का परिचय नानाजी देशमुख और श्री भाऊराव देवरस से हुई। जिन्होंने उनके भविष्य निर्माण में अहम भूमिका निभाई।

जनसंघ कनेक्शन

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की अध्यक्षता में 21 अक्तूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। जनसंघ के जरिए दीनदयाल ने भारतीय राजनीति में कदम रखा। साल 1952 में कानपुर में जनसंघ का प्रथम अधिवेशन हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय को उत्तर प्रदेश शाखा का पहला महासचिव बनाया गया। फिर उन्हें अखिल भारतीय महासचिव का पद मिला। आप पंडित दीनदयाल उपाध्याय की कार्य कुशलता का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि जनसंघ के कानपुर अधिवेशन में पारित हुए कुल 15 प्रस्तावों में 7 प्रस्ताव उपाध्याय थे।

साल 1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद जनसंघ को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दीनदयाल ने अपने कंधों पर ली। साल 1967 तक वह भारतीय जनसंघ के महासचिव रहे और इस दौरान दीनदयाल लगातार पार्टी को आगे बढ़ाने के मिशन में जुटे रहे।

मृत्यु

दिसंबर 1967 में भारतीय जनसंघ के 14वां अधिवेशन कालीकट में हुआ था। इस दौरान सर्वसम्मति से दीनदयाल उपाध्याय को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था। हालांकि इस दौरान वह मात्र 43 दिन ही अध्यक्ष रह सके। क्योंकि 10 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय लखनऊ से पटना जाने के लिए रेलगाड़ी में बैठे और अगले दिन यानी की 11 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की लाश रेलवे लाइन के किनारे मिली। माना जाता है कि वह जौनपुर तक सही सलामत थे। लेकिन उसके बाद किसी ने उनको चलती ट्रेन से धक्का दे दिया और खंभे से टकरा जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

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