दीनदयाल उपाध्याय जयंती विशेषः भारतबोध के साथ वैश्विक कल्याण का पथ एकात्म दर्शन

By डॉ. राघवेंद्र शर्मा | Sep 24, 2021

धरती के हर मनुष्य के साथ ठीक वैसा व्यवहार हो, जैसा हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं। परिवार, समाज,देश और यहां तक कि विश्व के सभी शासक अपने पर निर्भर लोगों के साथ उनके हित को ध्यान में रखते हुए एक जैसा व्यवहार करें को एकात्म मानव दर्शन का बीज मंत्र है। वस्तुतः पूरे जगत में एक ही चेतना का विस्तार है। मनुष्य, प्राणी औऱ पर्यावरणीय तत्व अपने सुखी और शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि औऱ आत्मा का समन्वय है। इन चारों का आपसी समन्वय बिगड़ने से दुख और संकट उपजता है। राजशाही, लोकतंत्र, साम्यवाद औऱ पूंजीवाद पर आधारित शासन व्यवस्था मनुष्य को आत्मिक समृद्धि औऱ भौतिक सुख एक साथ देनें में असफल साबित हुई हैं। जैसे मनुष्य में तन, मन, बुद्धि औऱ आत्मा होती हैं वैसे ही समाज में भी ये चार तत्व होते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र भी इन्ही चार तत्व होते हैं। देश के मौजूदा शासक दल का इसी एकात्म दर्शन की विचारभूमि पर खड़ा हुआ है। इस दर्शन को राजनीतिक विमर्श नवीसी में भले ही वाद या इज्म का नाम दिया जाता हो लेकिन सही मायनों में यह भारत का आधारभूत सैद्धान्तिक अधिष्ठान ही है। वेदों की ऋचायें से लेकर आदिगुरु के अद्वेन्त वेदांत तक औऱ प्रधानमंत्री जी के सबका साथ सबका विश्वास सबका विश्वास मूलतः एकात्म दर्शन की अभिव्यक्ति औऱ वचनबद्धता का दिगदर्शन ही कराता है। आज का भारत अगर लोकतंत्र के साथ वैश्विक व्यवस्था में अपनी प्रभावी भूमिका के साथ हमें नजर आ रहा है तो इसका आधार भी पार्टी के आराध्य पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा दिखाया गया एकात्म मानव दर्शन का पथ है जिसका अनुशीलन केंद्र और अन्य भाजपा शासित राज्य सरकारें कर रहीं है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्मक राज्य में केन्द्रीयकरण को कोई स्थान नही है वे स्पष्टतया एक समाज केंद्रित व्यवस्था के पक्षधर रहे है हाल ही में कोविड संकट के दौरान हमनें देखा कि मप्र की सरकार ने समाज की भागीदारी से किस तरह इस संकट का सामना किया है। वे एकात्म राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम जीवन स्तर की आश्वस्ति चाहते है। इस स्तर के बाद उत्तरोत्तर समृद्धि, राष्ट्र के लिए सम्यक प्रोधोगिकी, स्वदेशी की आवश्यकता ओर जोर देते हैं। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प और इसका रोडमैप भी भारत को एकात्मता की ओर उन्मुख करने वाला बुनियादी कदम है। भारत को भारतबोध के साथ वैश्विक कल्याण में अपनी भूमिका का शाश्वत पथ प्रशस्त करने वाले ऐसे महान मनीषी की जयंती पर शत शत नमन।

- डॉ. राघवेंद्र शर्मा

(लेखक: मप्र बाल अधिकार सरंक्षण आयोग के अध्यक्ष रहें हैं)

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