Prabhasakshi NewsRoom: Delhi को डराने के प्रयास पहले भी बहुत हुए, धमाके झकझोर सकते हैं मगर इसे तोड़ नहीं सकते

By नीरज कुमार दुबे | Nov 11, 2025

दिल्ली वह शहर है जो बार-बार जख्मी होता है, पर हर बार उठ खड़ा होता है। सोमवार की शाम जब पुरानी दिल्ली का आसमान लालकिले की ऐतिहासिक दीवारों पर ढलते सूरज की छटा समेट रहा था, तभी एक भीषण धमाके ने उस सन्नाटे को चकनाचूर कर दिया। शाम 6 बजकर 52 मिनट, सुभाष मार्ग ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ी सफेद हुंडई i20 (HR 26CE 7674) अचानक आग के गोले में बदल गई। नौ निर्दोष लोग मारे गए, बीस से अधिक घायल हुए और दिल्ली फिर एक बार आतंक के साए में सिमट गई।

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हम आपको बता दें कि विस्फोट के तुरंत बाद दिल्ली की सीमाएँ सील कर दी गईं। दारियागंज और पहाड़गंज जैसे इलाकों में पुलिस ने रात भर छापेमारी की। होटलों, सरायों, बाजारों, हर जगह तलाशी ली गई। इस मामले में यूएपीए और विस्फोटक अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है और विशेष प्रकोष्ठ, एफएसएल व एनआईए की टीमें जांच में जुटी हैं।

देखा जाये तो यह धमाका केवल एक कार में हुआ विस्फोट नहीं था, यह उस अतीत की गूंज थी जिसने दिल्ली को कई बार झकझोरा है। 1996 का लाजपत नगर बम धमाका, 2000 में लालकिले पर आतंकी हमला, 2001 का संसद पर हमला, 2005 के दिवाली ब्लास्ट, 2008 के कनॉट प्लेस, करोल बाग धमाके और 2011 का हाईकोर्ट ब्लास्ट, हर घटना ने दिल्ली के दिल पर एक स्थायी दाग छोड़ा है। आज जब लालकिले के पास फिर धमाका हुआ है, तो इतिहास खुद को दोहराता प्रतीत होता है।

लाल किले के पास हुआ धमाका दिल्ली के लिए कोई नई तरह की घटना नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी को डराने के प्रयास पहले भी हुए हैं, कभी बम धमाकों से, कभी गोलियों से तो कभी नफरत के जहर से। लेकिन हर बार इस शहर ने राख से उठकर खुद को फिर सजाया है। यह वही दिल्ली है जिसने संसद पर हुए हमले के बाद भी लोकतंत्र की लौ जलाए रखी, यह वही दिल्ली है जिसने बाजारों में बारूद की गंध के बीच भी दिवाली के दीये जलाए। दिल्ली की मिट्टी में डर नहीं, दृढ़ता की गंध है और कोई ताकत उसे डिगा नहीं पाई। हर धमाके ने उसे झकझोरा जरूर, मगर तोड़ा नहीं। यह शहर गिरता नहीं, बस थोड़ी देर के लिए मौन हो जाता है और फिर आवाज़ बनकर गूंज उठता है- “हम डरेंगे नहीं!”

जहां तक सोमवार के घटनाक्रम की बात है तो कई सवालों का उठना लाजिमी है। सवाल है कि राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था में वो झरोखा आखिर क्यों बार-बार खुल जाता है, जिससे आतंक प्रवेश कर जाता है? दिल्ली जैसे शहर में, जहाँ हर गली में कैमरे हैं, हर वाहन की नंबर प्लेट दर्ज होती है, वहाँ दो घंटे तक खड़ी एक संदिग्ध कार किसी की नज़र से कैसे बची रही? देखा जाये तो आतंक उस मानसिकता का नाम है जो डर को शासन का औज़ार बना देती है। जब नागरिक अपने ही शहर में असुरक्षित महसूस करने लगते हैं, तो आतंक का लक्ष्य पूरा हो जाता है। इसलिए इस धमाके की जांच केवल यह न बताए कि किसने किया, बल्कि यह भी बताए कि हमारी सुरक्षा में चूक कहाँ हुई।

उधर, आज जब दिल्ली ने नींद से आँखें खोलीं, तो शहर का हर कोना उदासी में डूबा था। अख़बारों के पहले पन्ने, जो सामान्य दिनों में रंगों और विज्ञापनों से सजे रहते हैं, आज काले-सफेद शोक की छवि में डूबे हुए थे। राजधानी ने बहुत समय बाद ‘रंग’ नहीं, ‘दर्द’ में छपी खबरें देखीं। यह सिर्फ एक विस्फोट की कहानी नहीं, बल्कि उस शहर के भीतर की ख़ामोशी का चित्र है जो बार-बार अपने ही लोगों को खो देता है।

बहरहाल, लालकिला सिर्फ एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, यह भारत के गौरव और स्वतंत्रता का प्रतीक है। उसके साए में हुआ यह धमाका सिर्फ एक अपराध नहीं, यह राष्ट्र की आत्मा को ललकार है। आज ज़रूरत है उस सतर्कता, एकजुटता और विवेक की, जो हमें फिर से ‘सिर्फ प्रतिक्रिया’ नहीं, बल्कि रोकथाम की तैयारी की दिशा में ले जाए। दिल्ली का दिल फिर घायल है। सवाल अब यह नहीं कि धमाका कैसे हुआ— सवाल यह है कि कब तक होगा?''

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