By अभिनय आकाश | Oct 13, 2026
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि रामलीला और दूसरे सांस्कृतिक या धार्मिक कार्यक्रमों के लिए पब्लिक ग्राउंड अलॉट करने का आधार सिर्फ़ पहले आओ, पहले पाओ (first come, first served) वाली पॉलिसी नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि इस तरीके से आवेदकों के लिए असमान मौके बन सकते हैं और यह संवैधानिक निष्पक्षता की ज़रूरतों को अपने-आप पूरा नहीं करता। जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि पब्लिक सुविधा के लिए सबसे पहले आवेदन करने वाले का दावा ही सबसे मज़बूत हो, यह ज़रूरी नहीं है। उन्होंने दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) को निर्देश दिया कि वह अपने मौजूदा निर्देशों की समीक्षा करे और ग्राउंड अलॉटमेंट के लिए व्यापक सालाना गाइडलाइंस बनाए। कोर्ट ने कहा, किसी मानदंड का निश्चित होना और उसका तर्कसंगत होना दो अलग-अलग बातें हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी पॉलिसी को सिर्फ़ इसलिए सही नहीं ठहराया जा सकता कि आवेदन मिलने की तारीख और समय का पता आसानी से लगाया जा सकता है।
एक ही जगह और बुकिंग के समय के लिए आवेदन आम तौर पर एक तय समय-सीमा के अंदर ही मंगाए जाने चाहिए। जब कई योग्य आवेदक एक ही मैदान के लिए आवेदन करें, तो उनके दावों की जांच पहले से तय और पब्लिश किए गए स्कोरिंग मैट्रिक्स या दूसरे पारदर्शी तरीकों से की जानी चाहिए। गाइडलाइंस में शिकायत दूर करने का सिस्टम भी होना चाहिए और यह पक्का करना चाहिए कि इवेंट शुरू होने से काफी पहले ही अलॉटमेंट और आम शिकायतों से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी हो जाएं। कोर्ट ने उन संगठनों को बार-बार वही मैदान अलॉट करके असल में एकाधिकार (monopoly) बनाने के खिलाफ चेतावनी दी, जिन्होंने पिछले सालों में वहां कार्यक्रम आयोजित किए थे। कोर्ट ने कहा कि निरंतरता और अनुभव अहम बातें हो सकती हैं, लेकिन दूसरे दावेदारों के दावों को नजरअंदाज करके सिर्फ़ इन्हीं के आधार पर फैसला नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि नियमों का ठीक से पालन करने वाले संगठन को थोड़ी प्राथमिकता मिल सकती है, लेकिन ऐसी प्राथमिकता से अलॉटमेंट का कोई पक्का अधिकार नहीं बन जाता।