By अभिनय आकाश | Sep 15, 2026
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि रेप सर्वाइवर को यौन हमले से हुई प्रेग्नेंसी को जारी रखने और उसकी मर्ज़ी के बिना उसे माँ बनने के लिए मजबूर करना, सम्मान के साथ जीने के उसके अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। कोर्ट ने यह बात 15 साल की रेप सर्वाइवर की ओर से दायर याचिका को मंज़ूरी देते हुए कही, जिसमें प्रेग्नेंसी खत्म करने की मांग की गई थी। यह प्रेग्नेंसी 30 हफ़्ते से ज़्यादा की हो चुकी थी। जस्टिस मधु जैन ने कहा कि यौन हमले से जुड़े मामलों में, सिर्फ़ इस बात को अकेले आधार नहीं माना जा सकता कि प्रेग्नेंसी 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट' के तहत तय कानूनी सीमा से आगे निकल गई है।
अदालत ने कहा कि उसे यह कहना पड़ रहा है कि ऐसे मामले ‘गहरी पीड़ा’ छोड़ जाते हैं। उसने इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि याचिकाकर्ता केवल 15 साल की बच्ची है, जो पहले ही एक भयानक यौन हमले का सदमा झेल चुकी है और उसकी मुश्किल स्थिति को और बढ़ाने वाली बात यह है कि उसने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया है। अदालत ने कहा कि जिस उम्र में किसी बच्चे को सुरक्षा और देखभाल मिलनी चाहिए और उसे सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल में बढ़ने का मौका मिलना चाहिए, उस उम्र में उसे ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिनका सामना किसी भी बच्चे को कभी नहीं करना चाहिए। न्यायमूर्ति ने कहा, ‘‘इस अदालत की नजर में, 15 साल की बच्ची को केवल इसलिए ‘मां’ नहीं कहा जा सकता क्योंकि यौन हिंसा के कारण उसे गर्भवती होने के लिए मजबूर किया गया है। इसमें कहा गया कि अदालत के संज्ञान में यह तथ्य है कि माता-पिता दोनों के न रहने से लड़की के हालात और मुश्किल हो गए हैं।
अदालत ने कहा कि कानून भले ही उपाय और प्रक्रियाएं उपलब्ध कराए, लेकिन उसका कोई भी आदेश उस सदमे को मिटा नहीं सकता जो बच्ची ने सहा है। अदालत ने याचिका को मंजूरी देते हुए लेडी हार्डिंग चिकित्सा महाविद्यालय और एस के अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक को निर्देश दिया कि वह लड़की का गर्भपात कराने की यथाशीघ्र व्यवस्था करें और प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखें। अदालत ने चिकित्सकों को निर्देश दिया कि वे दुष्कर्म के मामले में दर्ज प्राथमिकी के सिलसिले में डीएनए पहचान और अन्य प्रक्रिया के लिए ऊत्तकों या भ्रूण के हिस्से को सुरक्षित रखें। पीठ ने सरकार को गर्भपात से जुड़े सभी खर्च उठाने का निर्देश दिया, जिसमें प्रक्रिया, दवाएं, जांच, अस्पताल में भर्ती, भोजन और इलाज से जुड़ी अन्य जरूरतें शामिल हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि अगर चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होता है, तो उसकी चिकित्सा देखभाल के लिए सभी संभव उपाय किए जाएं और बाल कल्याण समिति कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाए।