By अभिनय आकाश | Oct 23, 2026
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) और वंचित समूहों के छात्रों को स्कूल यूनिफॉर्म देने के बजाय नकद सहायता देने का सरकार का फैसला "पूरी तरह से मनमाना, सनकी या स्वेच्छाचारी" नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने इस नीति को सही ठहराने वाले अपने पहले के फैसले को चुनौती देने वाली एक पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटिशन) को खारिज कर दिया। जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने कहा कि अदालतें आमतौर पर नीतिगत फैसलों में दखल नहीं देतीं, जब तक कि वे इतने मनमाने, सनकी या स्वेच्छाचारी न हों कि अदालत की अंतरात्मा को ही झकझोर दें। बेंच ने कहा कि यह पुनर्विचार याचिका असल में पूरे मामले पर फिर से बहस करने की एक कोशिश थी, जो कि पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र (रिव्यू ज्यूरिसडिक्शन) के सीमित दायरे से बाहर है।
सरकार ने यह भी बताया कि 'गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस' (GeM) के जरिए टेंडर प्रक्रिया पूरी करने में आमतौर पर लगभग छह महीने लग जाते हैं, और अलग-अलग स्कूलों की यूनिफॉर्म के डिजाइन, रंग और विनिर्देश (स्पेसिफिकेशन) भी अलग-अलग होते हैं। इस नीति को स्वीकार करते हुए, उच्च न्यायालय ने इस साल जनवरी में अपने 13 अप्रैल, 2023 के आदेश में बदलाव किया और सरकार को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि छात्रों को नीति के अनुसार यूनिफॉर्म के लिए पर्याप्त राशि मिले। इस फैसले को चुनौती देते हुए 'जस्टिस फॉर ऑल' ने तर्क दिया कि उन्हें जवाब दाखिल करने का मौका नहीं दिया गया और यह नीति RTE अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ है। प्रक्रिया संबंधी इस आपत्ति को खारिज करते हुए, पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका दायर होने के बाद याचिकाकर्ता को पर्याप्त समय दिया गया था। उनके वकील अदालत में पेश हुए थे, उन्होंने पूरे मामले पर बहस की थी और जवाब दाखिल करने के लिए कोई अतिरिक्त समय नहीं मांगा था। इसलिए, अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया कि पिछली पुनर्विचार कार्यवाही की ठीक से सुनवाई नहीं हुई थी।