By नीरज कुमार दुबे | Jul 31, 2026
लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन जब प्रदर्शन हिंसा में बदल जाए, सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर, बोतलें और अन्य वस्तुएं बरसाई जाएं और कानून व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मी लहूलुहान हो जाएं, तब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर उनकी पीड़ा की आवाज कौन उठाएगा? 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान घायल हुए दिल्ली पुलिस के जवानों के परिजनों और दिल्ली पुलिस महासंघ ने आज एक साझा संदेश दिया कि संसद और देश में केवल प्रदर्शनकारियों की चोटों की नहीं, बल्कि ड्यूटी निभाते हुए घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा पर भी चर्चा होनी चाहिए।
घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने कहा कि संसद और सार्वजनिक विमर्श में अब तक चर्चा मुख्य रूप से पुलिस कार्रवाई और कथित प्रताड़ना के आरोपों पर केंद्रित रही, जबकि ड्यूटी के दौरान घायल हुए जवानों और उनके परिवारों की तकलीफ को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया। परिजनों ने बताया कि अस्पतालों से आने वाले फोन का इंतजार, खून से लथपथ अपनों को घर लौटते देखना और उसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी पीड़ा की अनदेखी होते देखना उनके लिए किसी दूसरी त्रासदी से कम नहीं था।
हम आपको यह भी बता दें कि इसी क्रम में दिल्ली पुलिस महासंघ ने भी पुलिस कार्रवाई का मजबूती से बचाव किया। महासंघ के वरिष्ठ सदस्य और सेवानिवृत्त एसीपी केपी कुकरेती ने कहा कि जब कोई भीड़ हिंसक होकर गैरकानूनी जमावड़े में बदल जाती है, तब कानून के अनुसार उस भीड़ का प्रत्येक सदस्य जिम्मेदार माना जाता है। उन्होंने कहा कि यदि भीड़ बैरिकेड तोड़ती है, पत्थर, डंडों और अन्य वस्तुओं से हमला करती है तथा धारा 163 के तहत जारी चेतावनियों की भी अनदेखी करती है, तो कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास सीमित विकल्प ही बचते हैं।
कुकरेती ने स्पष्ट कहा कि यदि प्रदर्शनकारियों को संसद परिसर तक पहुंचने दिया जाता, तो यह केवल सुरक्षा में गंभीर चूक ही नहीं बल्कि देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण भी बन सकता था। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में घटनास्थल पर मौजूद वरिष्ठ अधिकारी को ही यह निर्णय लेना पड़ता है कि अपनी जान, आम नागरिकों और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा कैसे की जाए। उस समय न राज्यपाल, न मुख्यमंत्री और न ही गृह मंत्री मौके पर मौजूद होते हैं; जिम्मेदारी वहीं तैनात अधिकारी के कंधों पर होती है।
दिल्ली पुलिस महासंघ ने सबसे बड़ा सवाल भी उठाया। कुकरेती ने कहा कि यदि पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि हिंसा के दौरान घायल हुए 128 पुलिसकर्मियों पर हमला किसने किया? आखिर उन जवानों के खून का जिम्मेदार कौन है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और संसद की सुरक्षा के लिए ड्यूटी पर तैनात थे?
बहरहाल, लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी आंदोलन को हिंसा का लाइसेंस नहीं माना जा सकता। यदि प्रदर्शनकारी कानून तोड़ते हैं, सुरक्षाबलों पर हमला करते हैं और संवैधानिक संस्थाओं की सुरक्षा को चुनौती देते हैं, तो केवल पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना एकतरफा दृष्टिकोण होगा। उतना ही जरूरी यह पूछना भी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सीमा किसने लांघी, पुलिसकर्मियों को घायल किसने किया और उनके परिवारों के दर्द की जिम्मेदारी कौन लेगा। लोकतंत्र तभी संतुलित माना जाएगा, जब प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ-साथ कानून की रक्षा में खड़े पुलिसकर्मियों के सम्मान, सुरक्षा और बलिदान को भी समान संवेदनशीलता और गंभीरता से देखा जाएगा।