प्रजातंत्र को वास्तविक गणतंत्र में बदलने की जरूरत

By प्रो. संजय द्विवेदी | Jan 24, 2026

आजादी के लगभग 8 दशक पूरे करने के बाद भारतीय गणतंत्र एक ऐसे मुकाम पर है, जहाँ से उसे सिर्फ आगे ही जाना है। अपनी एकता, अखंडता और सांस्कृतिक व नैतिक मूल्यों के साथ पूरी हुई इन 8 दशकों की यात्रा ने पूरी दुनिया के मन में भारत के लिए एक आदर पैदा किया है। यही कारण है कि हमारे भारतवंशी आज दुनिया के हर देश में एक नई निगाह से देखे जा रहे हैं। उनकी प्रतिभा का आदर और मूल्य भी उन्हें मिल रहा है। हमें सोचना होगा कि आखिर हम उस सपने को कैसा पूरा कर सकते हैं जिसे पूरे करने के लिए सिर्फ कुछ साल बचे हैं। यानि 2047 में भारत को महाशक्ति और विश्वगुरु बनाने का सपना।

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आकांक्षावान भारत का उदयः

भारी संख्या में युवा शक्तियों से सुसज्जित देश अपनी आंकाक्षाओं की पूर्ति के लिए अब किसी भी सीमा को तोड़ने को आतुर है। युवाशक्ति तेजी के साथ नए-नए विषयों पर काम कर रही है, जिसने हर क्षेत्र में एक ऐसी प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील पीढ़ी खड़ी की है, जिस पर दुनिया विस्मित है। सूचना प्रौद्योगिकी, फिल्में, कृषि और अनुसंधान से जुड़े क्षेत्रों या विविध प्रदर्शन कलाएँ हर जगह भारतीय प्रतिभाएँ वैश्विक संदर्भ में अपनी जगह बना रही हैं। शायद यही कारण है कि भारत की तरफ देखने का दुनिया का नजरिया पिछले एक दशक में बहुत बदला है। ये चीजें अनायास और अचानक घट गईं हैं, ऐसा भी नहीं है। देश के नेतृत्व के साथ-साथ आम आदमी के अंदर पैदा हुए आत्मविश्वास ने विकास की गति बहुत बढ़ा दी है। भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता की तमाम कहानियों के बीच भी विश्वास के बीज धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले रहे हैं।

कई स्तरों पर बंटे समाज में भाषा, जाति, धर्म और प्रांतवाद की तमाम दीवारें हैं। कई दीवारें ऐसी भी कि जिन्हें हमने खुद खड़ा किया है और हमारा बुरा सोचने वाली ताकतें उन्हें संबल दे रही हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर भी जब देश बँटा हुआ नज़र आता है, तो कई बार आम भारतीय का दुख बढ़ जाता है। घुसपैठ की समस्या भी एक ऐसी समस्या है जिससे लगातार नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। किसी तरह भी वोट बैंक बनाने और सत्ता हासिल करने की होड ने तमाम मूल्यों को शीर्षासन करा दिया है। ऐसे में जनता के विश्वास की रक्षा कैसे की जा सकती है? आजादी के इतने साल के बाद लगभग वही सवाल आज भी खड़े हैं, जिनके चलते देश का बँटवारा हुआ और महात्मा गांधी जैसी विभूतियां भी इस बँटवारे को रोक नहीं पाईं। देश के अनेक हिस्सों में चल रहे अतिवादी आंदोलन, चाहे वे किसी नाम से भी चलाए जा रहे हों या किसी भी विचारधारा से प्रेरित हों। सबका उद्देश्य भारत की प्रगति के मार्ग में रोड़े अटकाना ही है। अनेक विकास परियोजनाओं के खिलाफ इनका हस्तक्षेप यह बताता है कि सारा कुछ बेहतर नहीं है। गणतंत्र को सार्थक करने के लिए हमें साधन संपन्नों और हाशिये पर खड़े लोगों को एक तल पर देखना होगा। क्योंकि आजादी तभी सार्थक है, जब वह हिंदुस्तान के हर आदमी को समान विकास के अवसर उपलब्ध कराए। कानून की नजर में हर आदमी समान है, यह बात नारे में नहीं, व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।

अंतिम आदमी का कीजिए विचार-

गणतंत्र के बारे में कहा जाता है कि वह सौ सालों में साकार होता है। भारत ने इस यात्रा की भी काफी यात्रा पूरी कर ली है। बावजूद इसके हमें डा. राममनोहर लोहिया की यह बात ध्यान रखनी होगी कि ‘लोकराज लोकलाज से चलता है।’ इसी के साथ याद आते हैं पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग, जिन्होंने एकात्म मानववाद का दर्शन देकर भारतीय राजनीति को एक ऐसी दृष्टि दी है, जिसमें आम आदमी के लिए जगह है। यह दर्शन हमें दरिद्रनारायण की सेवा की मार्ग पर प्रशस्त करता है। महात्मा गांधी भी अंतिम व्यक्ति का विचार करते हुए उसके लिए इस तंत्र में जगह बनाने की बात करते हैं। हमें सोचना होगा कि गणतंत्र के इन वर्षों में उस आखिरी आदमी के लिए हम कितनी जगह और कितनी संवेदना बना पाए हैं। प्रगति और विकास के सूचकांक तभी सार्थक हैं, जब वे आम आदमी के चेहरे पर मुस्कान लाने में समर्थ हों। क्या ऐसा कुछ बताने और कहने के लिए हमारे पास है? यदि नहीं...तो अभी भी समय है भारत को महाशक्ति बनाना है, तो वह हर भारतीय की भागीदारी से ही सच होने वाला सपना है। देश के तमाम वंचित लोगों को छोड़कर हम अपने सपनों को सच नहीं कर सकते। क्या हम इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार हैं।

तलाशिए सवालों के जवाबः

गणतंत्र दिवस इन तमाम सवालों के जवाब खोजने की एक बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आया है। बीते समय में आतंकवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयता की तमाम गंभीर चुनौतियों के सामने हमारा तंत्र बहुत बेबस दिखा। बावजूद इसके लोकतंत्र में जनता की आस्था बची और बनी हुयी है। हमारी एकता को तोड़ने और मन को तोड़ने के तमाम प्रयासों के बावजूद आम हिंदुस्तानी अपनी समूची निष्ठा से इस देश को एक देखना चाहता है। यह संकल्प लेना होगा कि हम लोकतंत्र में लोगों के भरोसे को जगा पाएं। उनकी उम्मीदों पर अवसाद की परतें न चढ़ने दें। सपनों में रंग भरने की हिम्मत, ताकत और जोश से भरा हो- आम हिंदुस्तानी तो इसी सपने को सच होते हुए देखना चाहता है। यह संयोग ही है कि नया साल और गणतंत्र दिवस हम एक ही महीने जनवरी में मनाते हैं। जाहिर तौर पर हर नए साल का मतलब कलैंडर का बदलना भर नहीं है वह उत्सव है संकल्प का, अपने गणतंत्र में तेज भरने का। आम आदमी में जो भरोसा टूटता दिखता है उसे जोड़ने का। गणतंत्र को तोड़ने या कमजोर करने में लगी ताकतों के मंसूबों पर पानी फेरने का। जनवरी का महीना इसीलिए बहुत खास है क्योंकि यह महीना देश की अस्मिता को पहली बार झकझोर कर जगाने वाले सन्यासी विवेकानंद की जन्मतिथि( 12 जनवरी) का महीना है। जिन्होंने पहली बार भारत के दर्शन को विश्वमंच पर मान्यता ही नहीं दिलायी हमारे दबे-कुचले आत्मविश्वास को जागृत किया। यह महीना है नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन ( 23 जनवरी) का जिन्होंने विदेशी सत्ता के दांत खट्टे कर दिए और विदेशी भूमि पर भारतीयों के सम्मान की रक्षा के लिए अपनी सेना खड़ी की। जाहिर तौर पर यह महीना सही संकल्पों और महानायकों की याद का महीना है। इससे हमें प्रेरणा लेने और आगे बढ़ने की जरूरत है। नए साल का सूरज हमें एक नयी रोशनी दे रहा है उसका उजास हमें नई दृष्टि दे रहा है। क्या हम इस रोशनी से सबक लेकर, अपने महानायकों की याद को बचाने और देश को महाशक्ति बनाने के सपने के साथ खड़ा होने का हौसला दिखाएंगें?

- प्रो.संजय द्विवेदी

अध्यक्ष, जनसंचार विभाग,

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल

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