लोकसभा चुनाव में झूठतंत्र के बढ़ने से आहत हुआ लोकतंत्र

By ललित गर्ग | May 18, 2019

आम चुनाव- 2019 में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति अपनी गति से आगे बढ़ रही है, इन चुनावों से उभरता एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि झूठ, फरेब एवं असत्य बयानों में राजनीति श्रीहीन हो रही है। कहीं हमसे सही विकल्प की तलाश के नाम पर शून्य तो नहीं पैदा करवाया जा रहा है? जनता को गुमराह करने की कोशिशें हर दल के नेता कर रहे हैं। कहते हैं कि मोहब्बत और जंग में सब जायज है लेकिन भारत के भाग्य को निर्मित करने के इस महाअनुष्ठान के नाम पर सब जायज कैसे हो सकता है? भारत में होने वाले ये आम चुनाव भी अब एक त्रासद युद्ध में ही तब्दील होते दिख रहे हैं। लोक द्वारा तंत्र का चुनाव और आज वहीं पर मतदाता दिग्भ्रमित एवं उलझन में हैं। स्वस्थ एवं आदर्श राष्ट्र निर्माण को लेकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए, लेकिन गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लोकतंत्र घायल है। झूठे एवं निराधार आरोप आतंक का रूप ले चुके हैं।

जो देखने एवं सुनने में आ रहा है, वह बहुत हास्यास्पद है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आमजनता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चैकीदार चोर है का आरोप लगा रहे हैं, दूसरी ओर अदालत में इस तरह के आरोप पर माफी भी मांग रहे हैं, बड़ा विरोधाभास है। वह बिना सोच-समझे कुछ भी बोल रहे हैं, सच-झूठ की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। वह न केवल नए-नए झूठ गढ़ रहे हैं, बल्कि अपने पुराने झूठ पर भी टिके हुए हैं। ऐसा लगता है कि वह इससे अवगत नहीं है कि झूठ के पैर नहीं होते और इसीलिए अब वह वहां तक कहने लगे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने सेना में काम करने वाले लोगों के पैसे खुद चोरी करके अनिल अंबानी के खाते में 30 हजार करोड़ रुपये डाल दिए। पहले वह अनिल अंबानी की जेब का हवाला देते थे। अब वह उनके बैंक खाते का जिक्र कर रहे हैं। क्या यह उचित नहीं होगा कि वह इसके सबूत दे दें कि मोदी ने अनिल अंबानी के किस खाते में कब 30 हजार करोड़ रुपये डाल दिए? चूंकि वह अपने अटपटे आरोपों को लेकर गंभीर नहीं इसलिए अपनी सुविधा में इस रकम को घटाते-बढ़ाते भी रहते हैं। वह कभी 30 हजार करोड़ रुपये का जिक्र करते हैं और कभी 45 हजार करोड़ रुपये का। एक समय वह इस राशि को एक लाख तीस हजार करोड़ बताया करते थे। हाल की एक रैली में तो उन्होंने अनिल अंबानी को चोर भी कह दिया। यह कितना उचित है? पर इसे सत्ता की ठसक कहें या फिर पांच चरणों के चुनाव के बाद हार की किसी आशंका? राहुल गांधी ये भी भूल गए कि राजनीति लोकलाज से चलने वाली चीज है, जिसका आधार सच होता है। उन्होंने न केवल अमेठी बल्कि समूचे राष्ट्र के मतदाताओं को भ्रमजाल में रखा है। लेकिन मतदाता अब जागरूक है, समझदार भी हो गया है और अपने विवेक से निर्णय लेने की स्थिति में भी आ गया है। वह अब इसके लिये तैयार नहीं है कि उनकी ताकत से केवल एक परिवार का भला होता रहे और उनकी हालात बद से बदतर बनी रहे। राहुल गांधी के हावभाव को देखते हुए हम अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी पार्टी एवं वे हार की तरफ बढ़ रहे हैं। शायद इसी बौखलाहट में वे बेबुनियादी एवं भ्रामक आरोपों का सहारा ले रहे हैं।

आखिर जब राहुल गांधी बिना किसी प्रमाण एवं आधार के मोदी को चोर कह सकते हैं तो इस आरोप के जबाव में इस सच का जिक्र क्यों नहीं किया जा सकता कि बोफोर्स तोप सौदे में दलाली के आरोपों से राजीव गांधी की छवि तार-तार हो गई थी? वैसे इस तरह के आरोपों से बचा जाना चाहिए। लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी बता दिया तो इस आरोप से राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेता तिलमिला उठे। क्या कांग्रेस यह नहीं जानती कि बोफोर्स सौदे में दलाली के लेन-देन के सुबूत भी सामने आए थे और इसके भी कि दलाली की रकम किसके खाते में पहुंची?

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चुनाव का समय सच को सामने लाने का समय होता है, लेकिन हमारे लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि यहां चुनाव में सच का नहीं बल्कि झूठ का ही बोलबाला होता है। भारत अभी तक एक है। संविधान एक है। लोकसभा एक है। राष्ट्र ध्वज एक है। केन्द्रीय सरकार एक है। सेना एक है। मुद्रा एक है। भण्डार एक है लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए। सबसे ज्यादा जरूरी है कि चाहे पक्ष हो या विपक्ष- सबके लिये बुनियादी सत्य भी एक ही होना चाहिए। हमें उन धारणाओं, मान्यताओं एवं बयानों को भी बदलना होगा, जिन्हें औरों के सन्दर्भ में बनाकर हमने गलतफहमियों, सन्देहों और आशंकाओं की दीवारों को इतना ऊंचा खड़ा कर दिया है कि स्पष्टीकरण के साथ उन्हें मिटाकर सच तक पहुंचने के सारे रास्ते ही बन्द हो गये है। यह प्रश्न आज देश के हर नागरिक के दिमाग में बार-बार उठ रहा है कि किस प्रकार सच को पहचाना जाए? आखिर इन सबका जवाब जनता को ही देना है और वह अवश्य देगी। हर बार भारतीय जनता अपने मतों से पूरा पक्ष बदल देती है। कभी इस दल को, कभी उस दल को, कभी इस विचारधारा को, कभी उस विचारधारा को। लेकिन देश को सक्षम एवं सुदृढ़ बनाने वाले प्रत्याशियों को कब चुनेगी, अब तक संभवतया भारत की जनता अपना निर्णय देने में चुक करती रही है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा।

हास-परिहास हमेशा से चुनावी बयानबाजी का अहम हिस्सा रहा है। इनदिनों राहुल गांधी के बयान भी ऐसे ही हास्यास्पद एवं विवादास्पद है। ऐसा कैसे संभव है कि राहुल गांधी को हर तरह का झूठ बोलने का अधिकार मिले, लेकिन अन्य कोई तथ्यों के हवाले से भी कुछ कहे तो उसे सामंतशाही एवं तानाशाही करार दे दिया जाये। राहुल गांधी अब यह भी दावा कर रहे हैं कि मोदी ने जनता का पैसा चोरी करके नीरव मोदी और मेहुल चैकसी के खातों में भी डाला। उनकी मानें तो मोदी ने विजय माल्या को भी दस हजार करोड़ दिए। क्या वे देश की जनता को इस तरह के आरोप लगाने के साथ-साथ यह बताने का भी श्रम करेंगे कि यह रकम कब और कैसे विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चैकसी के खातों में डाली गयी? उसके सबूत भी वे जनता की अदालत में प्रस्तुत करें। इस तरह का झूठ बोलने में माहिर हासिल करना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है अपनी कही बात को साबित करना। अगर वे आरोपों को सच सिद्ध कर सकेंगे तो यह इस लोकतंत्र के महापर्व की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी, इससे उनका जनता में विश्वास भी कायम होगा एवं देश का लोकतंत्र मजबूत भी होगा। हमें इन चुनावों में किसी पार्टी विशेष का विकल्प नहीं खोजना है। किसी व्यक्ति विशेष का विकल्प भी नहीं खोजना है। विकल्प तो खोजना है भ्रष्टाचार का, झूठे आरोपों का, अकुशलता का, राजनीतिक अपराधीकरण का, प्रदूषण का, भीड़तंत्र का, गरीबी के सन्नाटे का, बेरोजगारी का, नारी अत्याचारों का, महंगाई का। यह सब झूठे एवं बेबुनियाद बयानों एवं राजनीतिक स्वार्थों से संभव नहीं है।

- ललित गर्ग

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