ईएमआई पर लोकतंत्र (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Nov 22, 2025

मिसिरबाबू, आपको एक बार फिर लख-लख बधाइयाँ! आप उस राष्ट्रीय सर्कस से बच निकले हैं जिसका नाम है 'बिहार विधानसभा सत्र'। मुबारक हो कि आप अभी भी अपने विवेक की सीट पर सुरक्षित हैं, न कि 'ज़ोरदार नारेबाज़ी' की भगदड़ में वेल ऑफ़ द हाउस के मुँहाने पर खड़े हैं। जहाँ हज़ारों लोग 'जनता के मुद्दे' भूलकर एक-दूसरे पर 'व्यक्तिगत वार' करने की ईएमआई बाँध चुके हैं, वहाँ आप मौन होकर लोकतंत्र की इज्ज़त बचा रहे हैं। क्या बेहतरीन क़िस्मत और क्या मज़बूत आत्म-संयम! आप उस 'सदन के शोर-शराबे' में कुचले नहीं गए, जहाँ देशभक्ति का सर्टिफ़िकेट अब आपके चीख़ने की क्षमता से तय हो रहा है। बड़ी बात है। निज़ाम ने 'विकास' और 'विवाद' का ऐसा कॉकटेल बनाया, और टीवी चैनलों ने आपकी आवाज़ दबाकर 'सत्ता बनाम विपक्ष' का ड्रामा बेचने के सौ तरीक़े ईजाद किए, फिर भी आपकी 'शालीनता की पूंजी' सुरक्षित है!

आजकल की विधानसभाओं में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है, मिसिरबाबू। सदन में 'जनता की सेवा' कम होती है, मगर 'भावनात्मक ड्रामा' और 'पारिवारिक कलह' का सीधा प्रसारण ज़्यादा होता है। बिहार चुनाव के बाद हमने देखा: नेताजी की बेटी ने ट्विटर पर राजनीतिक 'संन्यास' की घोषणा कर दी! यह किसी गंभीर नीतिगत मतभेद के कारण नहीं, बल्कि 'अपनों' द्वारा दरकिनार किए जाने के दुःख में था। यह संन्यास नहीं, बल्कि एक 'डिजिटल धमकी' है। सोचिए, एक विधायक (जो अभी तक विधायक नहीं बना) की कुर्सी छोड़ने की ख़बर, किसान के क़र्ज़ माफ़ी की ख़बर से ज़्यादा टीआरपी बटोर रही है। अब विधानसभा, लोकतंत्र का मंदिर कम और एक बड़ा 'पारिवारिक रियालिटी शो' ज़्यादा बन गई है। बाहर जनता को सड़क, पानी, बिजली चाहिए, और अंदर नेताजी के घर की लड़ाई को संसद-टीवी पर 'ब्रेकिंग न्यूज़' बना दिया जाता है!

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चुनाव होते ही सबसे पहला काम क्या होता है, मिसिरबाबू? हार स्वीकारना? नहीं! नया ट्रेंड है: 'ईवीएम और वोट-चोरी' का रोना। बिहार चुनाव में विपक्ष ने 200 से अधिक सीटें हारने के बाद भी यही किया। उनका तर्क है कि हमारी रैलियों में भीड़ थी, हमारी जनसभाओं में हुजूम था, तो फिर यह हार हुई कैसे? ज़रूर यह 'तकनीकी गड़बड़ी' है! यह 'वोट-चोरी' नहीं, बल्कि 'जनता-विरोधी निर्णय' को स्वीकारने का साहस न होना है। नेताजी यह नहीं कहेंगे कि हमारा नेतृत्व कमज़ोर था, हमारा चेहरा फीका पड़ गया। वे सीधे कहेंगे: निज़ाम ने 'सीक्रेट इन्फ़ोर्मेंट' (SIR) का इस्तेमाल करके यादव और मुस्लिम समुदायों के वोट हटा दिए हैं! यह चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' है, जहाँ आप हार को पचा नहीं पाते, तो उस पर 'डिजिटल हैकिंग' का आरोप लगा देते हैं।

वोट से ठीक पहले सीधे आपके खाते में 'सरकारी मेहरबानी' ट्रांसफर करवाना। सरकार इसे 'कल्याणकारी योजना' कहती है, पर यह सीधे-सीधे 'वोट खरीदो, पुण्य कमाओ' की स्कीम है। अब विधानसभा में यह सवाल नहीं पूछा जाता कि स्कूल क्यों नहीं बना? सवाल यह होता है कि 'मेरी सरकार ने तुम्हें कितना दिया?' यह राजनीति नहीं, एक 'थोक उपभोक्तावाद' है, जहाँ नागरिक 'वोटर' नहीं, बल्कि 'ग्राहक' बन जाता है, जो अगले कैश-बैक ऑफर का इंतज़ार करता है। और आप जैसे विवेक वाले लोग बस 'नोटा' का बटन दबाकर अपना आत्म-सम्मान बचाते हैं।  

बिहार के चुनावी नतीजों के बाद भी अजीबोगरीब सस्पेंस जारी है। गठबंधन ने प्रचंड जीत हासिल कर ली, मगर मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस पर दिल्ली-पटना में खींचतान चलती रहती है। एक नेता दूसरे नेता को 'सबसे बड़े नेता' का टैग देता है, मगर मन ही मन दोनों जानते हैं कि यह कुर्सी 'शतरंज की बिसात' पर रखी है। यह जनता के लिए नहीं, बल्कि 'आंतरिक सौदेबाजी' के लिए है। एक तरफ 'जंगलराज' को नकारने की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, दूसरी तरफ 'सबसे ज़्यादा आपराधिक रिकॉर्ड वाले विधायक' चुनकर विधानसभा में पहुँच जाते हैं। यह दिखाता है कि हमारी विधानसभाएँ 'आदर्शों' से नहीं, बल्कि 'आंकड़ों' और 'आपराधिक दबदबे' से चलती हैं।

मिसिरबाबू, अपनी सीट पर आप जितना शांत बैठे रहेंगे, उतनी ही तेज़ी से आप 'डिजिटल विस्मृति' की ओर बढ़ेंगे। आपका विवेक आपको संसद-कूप में कूदने से बचा रहा है, मगर क्या यह आपकी राजनीतिक ज़िंदगी बचा पाएगा? ईएमआई का जाल भी यहीं है, सोशल प्रेशर भी, ट्रोल करने वाली फ़ौज भी यहीं है, और 'चिल्लाने वाली ब्रिगेड' की अगली भर्ती भी जल्द शुरू होगी। उसका 'राजनीतिक बुलडोज़र' भी यहीं है। एक दिन सिस्टम आपकी सादगी, आपके विवेक की बलि तो लेकर रहेगा। हो सकता है कल को 'विधानसभा में कूदने के लिए न्यूनतम टीआरपी रेटिंग' का क़ानून आ जाए। तब तक के लिए, जब तक आप एक शांत और भरोसेमंद दर्शक बने हैं, कांग्रेचुलेशन्स मिसिरबाबू!  

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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