Dhar Bhojshala का 700 साल पुराना इंतजार खत्म, ASI रिपोर्ट के बाद अब गूंजेंगे स्तुति मंत्र

By अनन्या मिश्रा | Jun 06, 2026

सनातन के विराट, विशद वैभव का गुणगान करती धार की भोजशाला सदियों से जिस पल की प्रतीक्षा कर रही थी, वह आखिरकार आ ही गया। यह प्रतीक्षा सिर्फ धार नगरी के निवासियों की नहीं बल्कि कटक से लेकर लद्दाख और लक्षद्वीप से लेकर समस्त भारत वर्ष भी को भी थी। यह प्रतीक्षा उन लोगों को भी थी, जो अपनी आराध्य मां वाग्देवी के मंदिर को लेकर स्वप्न संजोए थे।

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सनातन के स्तंभ

परमार वंश के प्रतापी राजा भोज एक उद्भट विद्वान थे। उन्होंने 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन किया। वहीं 1034 ईस्वी में राजा भोज ने भोजशाल का निर्माण कराया था। कला और संस्कृति के उपासक राजा भोज ने धारा नगरी को कला और शिक्षा की राजधानी के रूप में विकसित किया था।

राजा भोज ने नालंदा और तक्षशिला की तरह यहां पर भी संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित किए। जहां देश-दुनिया के शोधार्थी, विद्वान और बटुक वेद-उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन करते थे। इससे पूर्वाभिमुख बहुमंजिला आयताकार भवन में विशाल सभा मंडप, सैंकड़ों नक्काशीदार कक्ष और स्तंभ थे। लेकिन विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भोजशाला का मुख्य प्रसाद, जहां पर कभी वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी, वह ही शेष बचा है।

बता दें कि परिसर में मौजूद 188 स्तंभ गवाही देते हैं कि कितनी मुश्किलें सहकर भी सनातन के गौरव को संभाले रखा। एमपी हाईकोर्ट के आदेश के बाद जब ASI के सर्वे में इन स्तंभों पर जमी धूल हटी, तो यहां का हर स्तंभ नई गाथा सुनाता नजर आया। परमारकालीन अद्भुत वास्तु शिल्प भोजशाला में मौजूद स्तंभों में नजर आता है।

यहां स्तुति मंत्र सुनाती हैं दीवारें  

भोजशाला के मुख्यद्वार से अंदर प्रवेश करते ही आपकी निगाहें बरबस ही काले पाषाण पर उत्कीर्ण प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखे शब्दों पर टिक जाएंगी। एक्सपर्ट बताते हैं कि यह पारिजात मंजरी नाट्य को लिपिबद्ध कर लगाया गया था।

तो वहीं कुछ पत्थरों पर मां सरस्वती के मंत्र और महादेव व श्रीराम का भी उल्लेख मिलता है। तो वहीं कुछ पत्थरों पर धारा नगरी के नगर नियोजन से जुड़ी जानकारी दर्ज मिलती है। दीवारों पर राजा भोज द्वारा बनवाए गए सिद्धि यंत्र और कालसर्प स्पष्ट नजर आते हैं। राजा भोज ने धार में 84 चौराहों का निर्माण कराया था। वहीं भोजशाला में 84 अलग-अलग यंत्र बनवाए गए थे।

700 वर्ष बाद तैयार हवनकुंड

भोजशाला परिसर के ठीक बीचोबीच में विशाल हवनकुंड है। इस हवन कुंड के निर्माण की तकनीकी को देखकर यह पता चलता है कि हमारा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान कितना समृद्ध था। कुंड गणितीय माप के मुताबिक है, मंडर का आकार और कुंड का आकार आहुतियों की संख्या पर और आहुतियों की संख्या अनुष्ठान पर निर्भर करती थी।

यज्ञकुंड में बड़ी मात्रा में घी के लिए भी व्यवस्था की गई थी। हर साल वसंत पंचमी के मौके पर राजा भोज भव्य आयोजन करते थे, जिसमें सरस्वती यज्ञ सबसे महत्वपूर्ण होता था। इस दौरान 500 महाविद्वान और कविगणों से सज्जित राजा भोज का राजदरबार इस उत्सव में शामिल होकर आहुतियां देता था। वहीं 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद से अब यह हवनकुंड मानो फिर से आहुतियों के लिए तैयार हो रहा है।

धार की धरोहर

परमार काल विज्ञान, ज्ञान, कला, स्थापत्य और संस्कृति के क्षेत्र में काफी ज्यादा उन्नत था। वाग्देवी की प्रतिमा जिस स्थान पर विराजमान थी, वहां गुंबद की नक्काशी चमत्कृत कर देती है। अष्टमल की और उसके आसपास की रचनाएं भी काफी मोहक हैं। इसके एक हिस्से में कई चक्रों की नक्काशी बनी है। भोजशाला के पूर्व उत्तर क्षेत्र के पास कमाल मौला मस्जिद भी नजर आती है। इस परिसर के भीतर सरस्वती कूप भी है, जिसको अकल कूप भी कहा जाता है। 

बताया जाता है कि इसके निर्माण में धातु विज्ञान और शिलाओं के एक्सपर्ट की सहायता ली गई थी। इस सरस्वती कूप पर 14 कोणीय संरचनाएं बनी हैं। यहां पर छात्र पढ़ाई करते थे, हालांकि अब भी इस कूप से जलधाराएं प्रवाहित होती हैं।

मंदिर है भोजशाला

एएसआई द्वारा 98 दिन किए गए सर्वे के बाद एमपी हाईकोर्ट में 24 दिन नियमित सुनवाई हुई। वहीं 15 मई को कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा, 'मंदिर ही भोजशाला है' तो इस फैसले से सालों से प्रतीक्षा कर रहे लोगों की आत्मा झंकृत हो उठा।

कोर्ट ने भोजशाला में पूजा के सीमित अधिकार को समाप्त कर दिया और पूरे साल दर्शन-पूजन की अनुमति दे दी। पूरे परिसर को मंदिर घोषित करते हुए कहा, यहां पूजा की परंपरा कभी खत्म नहीं हुई। यहां पर मिले साक्ष्य और स्थापत्य इसको राजा भोजकालीन सरस्वती मंदिर सिद्ध करते हैं। कोर्ट ने ASI के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें हर शुक्रवार को भोजशाला परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।

वाग्देवी की प्रतीक्षा

बता दें कि मां सरस्वती का 'शारदा सदन' कहलाने वाली भोजशाला में निर्बाध पूजा की अनुमति मिल गई। जिसके बाद अब लोगों को वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा की प्रतीक्षा है। जोकि साल 1875 में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाई गई थी। इस प्रतिमा का निमार्ण करीब 1034 ईस्वी में करवाया गया था।

वहीं 128.5 सेमी ऊची और करीब 250 किमी वजनी यह प्रतिमा धार क्षेत्र के भग्नावशेषों के बीच से मिली थी। अब लोगों को उस पल की प्रतीक्षा है, जब लंदन से मां वाग्देवी की प्रतिमा को लाकर दिव्य और भव्य 'सरस्वती लोक' के गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा।

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