Gyan Ganga: धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे और दुर्योधन समेत सभी पुत्र धर्म के विषय में अंधे थे

By आरएन तिवारी | Dec 04, 2020

हमारे धर्माचार्यों ने श्रीमद्भगवत गीता को संजीवनी की संज्ञा दी है। यह हमें जीने की राह बताती है। दुर्योधन के अपने जीवन मूल्यों से भटकने के कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें करोडों लोगों की मौत हुई ।

अर्जुन उवाचः

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ ।

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥

हे अच्युतानन्द ! कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें जिससे मैं देख सकूँ, कि किन लोगों के साथ मुझे युद्ध करना है। 

देखिए! गीता एक दिव्य साहित्य है। यदि आप अपने जीवन में दिव्यता चाहते हैं तो गीता को अपना मित्र अवश्य बनाएँ।  

पिछले अंक में हम धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह की चर्चा कर चुके हैं। आइए! इसी प्रसंग में आगे चलें। 

धृतराष्ट्र जन्म से तो अंधा था ही दुर्योधन आदि उसके पुत्र भी धर्म के विषय में अंधे थे। इसीलिए तो द्रौपदी ने कहा था— अंधे बाप का बेटा भी अंधा ही होता है। संजय, कुरुक्षेत्र में हो रहे युद्ध का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं।

  

संजय उवाच--- 

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।

सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ प्रतापवान्‌ ॥

हे राजन! दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। सर्व प्रथम कौरव सेना की ओर से भीष्म पितामह ने युद्ध प्रारम्भ करने के लिए सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥

पांडवों की तरफ से भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपना पांचजन्य और अर्जुन ने अपना देवदत्त नाम का शंख बजाया। 

देखिए! दोनों सेनाओं की तरफ से शंख ध्वनि हुई। पांडवों के शंख से शुभ ध्वनि निकली, कौरवों के शंख से अशुभ ध्वनि निकली और श्रीकृष्ण के शंख से विजय ध्वनि निकली। शुभ यानि लाभ और अशुभ यानि हानि। अब शुभ और लाभ के चक्रव्यूह में फँसकर अशुभ हारेगा ही न? महाभारत युद्ध का प्रतीकात्मक निर्णय पहले दिन ही हो चुका था। 

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

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युधिष्ठिर आदि पांडव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक हैं जब कि दुर्योधन आदि कौरव काम, क्रोध, मोह और लोभ के प्रतीक हैं। दुर्योधन भीष्म पितामह के पराक्रम की प्रशंसा कर रहा है, उसको पूरा विश्वास था कि भीष्म पितामह की उपस्थिति उसको अवश्य विजय दिलाएगी। उसे कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य से पूर्ण सहयोग की उम्मीद थी क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इन दोनों महानुभावों ने उस समय एक शब्द भी नहीं कहा था जब भरी सभा में द्रौपदी को दु:शासन निर्वस्त्र कर रहा था, और असहाय द्रौपदी इन दोनों महापुरुषों से अपनी लाज बचाने और अपनी इज्जत की रक्षा के लिए तड़पती हुई बार-बार गुजारिश कर रही थी। दुर्योधन को आशा थी कि वे पांडवों के प्रति अपने स्नेह और प्रेम को उसी प्रकार त्याग देंगे जिस प्रकार उन्होने द्यूत-क्रीडा के अवसर पर त्याग दिया था। किन्तु हठी दुर्योधन पितामह भीष्म के मनोभावों को अच्छी तरह से नहीं समझ सका था। उसको यह नहीं मालूम था कि नेक कर्म से ही शांति और सद्भाव संभव है, युद्ध से नहीं।

पितामह भीष्म भले ही दुर्योधन सेना की तरफ से लड़ रहे थे उनके अस्त्र-शस्त्र भी दुर्योधन के पक्ष में थे किन्तु उनका आशीर्वाद पांडवों के साथ था। आशीर्वाद में जो शक्ति होती है वह किसी भी अस्त्र-शस्त्र में नहीं हो सकती। 

अस्तु --------

जय श्रीकृष्ण ----------

- आरएन तिवारी

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