भारत में पाकिस्तानियों को मिल गई नागरिकता?

By डॉ. रमेश ठाकुर | Aug 17, 2026

किसी पाकिस्तानी को आज के दौर में हिंदुस्तान में बसाना, उन्हें पनाह देना या फिर नागरिकता देनी वाली बात, शायद ही किसी के गले उतरे? बसाना तो दूर, ऐसा सोचना मात्र भी, सूरज का पूरब की जगह पश्चिम से निकलने जैसा माना जाएगा। पर, यह कोरी कल्पना पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हुई। भारत में 56 साल पहले आए पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई है। वह भी एकाध लोगों को नहीं, बल्कि हजारों को। सरकार ने पिछले महीने बकायदा एक रंगारंग कार्यक्रम कर, ढोल-नगाड़े बजाकर विस्थापित पाकिस्तानियों को नागरिकता प्रमाण पत्र बांटे। ताज्जुब यह भी है कि ऐसा चमत्कार हुकूमत ने ऐसे माहौल में किया, जब समूचे भारत में विभिन्न देशों के घुसपैठियों को निकालकर उन्हें खदेड़ने का अभियान केंद्रीय व राज्य स्तरों पर छिड़ा हो। इस अभियान की बानगी हमने हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधाानसभा चुनाव के दौरान भी देखा। जब दो बॉर्डर राज्य, असम और पश्चिम बंगाल, का चुनाव इसी मसले के इर्दगिर्द घूमा। घुसपैठियों के अलावा भारत में कुछ वर्षों से एनआरसी और सीएए का भी शोर है। बावजूद इसके सरकार ने पाकिस्तानियों को नागरिकता देने का बड़ा जाखिम उठाया। सरकार ने यह कदम क्यों उठाया? हालांकि, इस फैसले के सियासी मायने बहुतेरे हैं, जिसकी तस्वीर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगी।

सरकार ने विस्थापितों को नागरिकता हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में दी है। जिले का नाम है पीलीभीत जो नेपाल बॉर्डर से एकदम सटा हुआ है जिसकी पहचान बांसुरी निमार्ण के अलावा तराई क्षेत्र के लिए भी प्रसिद्ध है। पीलीभीत को मिनी पंजाब भी कहते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज, जैव-विविधता के अलावा विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व तो है ही, धान की पैदावार के लिए भी जिला पूरे प्रदेश में विख्यात है। सरकार ने जिन परिवारों को बसाने का फैसला किया है उनमें बंगाली हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। भारत के नक्शे में देखें, तो पीलीभीत हिंदुस्तान के एक अलहदे छोर पर बसा है जहां करीब पांच दशक से भी ज्यादा पहले पाकिस्तान से आए विस्थापित लोग बस गए थे। तभी, से वह विभिन्न सरकारों से नागरिकता मांगते आए हैं। सरकारी कागजों के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान से वर्ष 1959 से 1971 के बीच पाकिस्तान से पीड़ित होकर कुछेक परिवार भारत आए थे। शुरूआत में यह परिवार कई राज्यों में भटकते रहे, कहीं ठिकाना नहीं मिला। आखिरकार उन्हें बाद में यही जिला मुफीद लगा। पीलीभीत के अलावा कुछ नागरिकता रामपुर और बिजनौर में बसे विस्थापितों को भी दी गई है।

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पीलीभीत के जिस क्षेत्र में यह परिवार रहते आए हैं वह जगह कभी विरान होती थी। इन लोगों ने इसे रहने लायक बनाया और उबड़खाबड़ जगहों पर मेहनत करके उसे खेतीबाड़ी के लिए तैयार किया। आज इस क्षेत्र में अच्छी फसलें उगती हैं। सभी के पास कागजी दस्तावेजों के रूप में भारतीय आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड इत्यादि पहले से मौजूद हैं। साथ ही लंबे वक्त से मतदान भी करते आए हैं। लेकिन नागरिकता और मालिकाना हक से वंचित थे, जिसे मौजूदा योगी सरकार ने पूरा कर दिया। ये परिवार पीलीभीत जिले के अमरिया, न्यूरिया, शारदा डैम की तलहटी सहित आसपास के क्षेत्रों में बसे हैं। सरकार ने उन्हें खेती और आवास के लिए जमीन तो पहले से दी हुई हैं। लेकिन मालिकाना हैसियत नहीं दी, जिसके लिए यह लोग दशकों जद्दोजहद कर रहे थे। प्रत्येक चुनावों में इनसे के झूठा आश्वासन हुआ। पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारों ने भी इनको नागरिकता दिलवाने का दिलासा दिया। पर, कुछ राजनैतिक अड़चनों के चलते वादा पूरा नही ंकर पाए। 

बीते 2022 के विधानसभा चुनाव में इनके साथ वादा किया गया था, जिसे अब पूरा किया गया। प्रदेश सरकार की पहल पर सभी पीड़ित परिवारों को सूचीबद्ध करके नागरिकता और मालिकाना के प्रमाण बांटे गए हैं। नागरिकता करीब 2500 परिवारों को दी गई हैं जिनकी कुल संख्या 15 हजार के आसपार है। ऐसा करके सरकार ने शायद विपक्षी दलों को बड़ा सियासी मुद्दा बैठे-बिठाए थमा दिया है। ये लोग वर्ष 1960 से 1975 के बीच धार्मिक प्रताड़ना के चलते पूर्वी बंगालादेश जो अब पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा है, से भारत आए थे और उत्तर प्रदेश के तराई के जिले पीलीभीत में आकर बसे। ये क्षेत्र पीलीभीत जिले की कलीनगर व पूरनपुर तहसीलों में आते हैं जहां ये करीब 25-26 गांवों में बसे हैं। पिछले महीने 29 जून को सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिले में दौरा हुआ जिसमें मुख्यमंत्री ने इनको ना सिर्फ नागरिकता के प्रमाण पत्र बांटे, बल्कि मालिकाना हक के सरकारी कागज भी दिए। 

यह फैसला चुनाव के ऐन वक्त लिया गया। प्रदेश में मात्र 6-7 महीनों बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए सरकार के इस निर्णय पर प्रदेश की राजनीति जमकर गर्माई हुई है। विपक्षी पार्टियों ने सीधे-सीधे एक बड़े वोटबैंक को साधने का आरोप मौजूदा सरकार पर लगाया है। पाकिस्तानी विस्थापियों को बसाने का यह पहला चरण है, अभी दूसरा चरण शेष है। 35 हजार लोग और हैं जो बहराईच, बाराबंकी, गोंडा, लखीमपुर, बिजनौर जैसे जिलों में बसे हैं। सभी को चिंहित किया जा चुका है, अगले कुछ महीनों बाद इन्हें भी मुकम्मल नागरिकता देने का फैसला हो चुका है। सरकारी आंकड़ों की माने तो प्रदेश के करीब सात-आठ जिलों में कुल 55 हजार विस्थापित पाकिस्तानियों की आबादी है, इनमें प्रत्येक वर्ष तेजी से इजाफा भी हो रहा है। 56 वर्ष पहले धार्मिक प्रताड़ना के रूप में मात्र 12 हजार 380 लोग आए थे। आबादी बढ़ाने के पीछे इनका मकसद था कि बढ़ी आबादी से सरकारों को वोटिंग का लालच देकर किसी भी दल पर दबाव बना सकेंगे। कमोबेश, हुआ भी वैसा ही। अपने योजनाओं में यह लोग आज सफल हुए हैं।

- डॉ. रमेश ठाकुर

सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

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