'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना

हम आपको बता दें कि 'Mr Ten Percent' उपनाम जरदारी पर लगे पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा रहा है। 1980 और 1990 के दशक में उन पर सरकारी परियोजनाओं और कारोबारी सौदों में 10 प्रतिशत कमीशन मांगने के आरोप लगाए गए थे।
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने ही देश की हिंदू आबादी को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति और वहां की तथाकथित धार्मिक सहिष्णुता के दावों पर फिर से बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हम आपको बता दें कि स्वतंत्रता दिवस समारोह से जुड़े एक कार्यक्रम में जरदारी ने भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को लेकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। सबसे सख्त पलटवार मशहूर लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने किया है।
जरदारी ने कहा कि भारत और पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों का नजरिया अलग है। उन्होंने कहा कि भारत 'अखंड भारत' की सोच रखता है, जबकि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की हिंदू आबादी का जिक्र करते हुए कहा कि वहां मुसलमान 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' यानी 'सहन' करते हैं। जरदारी ने यह दावा भी किया कि पाकिस्तान में हिंदू उतने ही स्वतंत्र और सुरक्षित हैं, जितने वे कहीं और हो सकते हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पाकिस्तान के हिंदू भारत की बजाय पाकिस्तान के साथ रहना ज्यादा पसंद करेंगे।
इसे भी पढ़ें: पाकिस्तानी राष्ट्रपति Asif Ali Zardari का दावा- Pakistan में हिंदू सुरक्षित और भारत से ज्यादा यहीं रहना करते हैं पसंद
देखा जाये तो यहीं जरदारी के बयान की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है। जिस देश के राष्ट्रपति को अपने नागरिकों की बराबरी, सुरक्षा और सम्मान की बात करनी चाहिए, वही राष्ट्रपति अल्पसंख्यक समुदाय के लिए 'हम उन्हें सहते हैं' जैसी भाषा इस्तेमाल करता दिखाई दे रहा है। देखा जाये तो सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें किसी देश के नागरिकों के अधिकारों को उनके धर्म के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय की 'सहनशीलता' से जोड़ दिया जाता है।
जरदारी का बयान इसलिए भी निशाने पर है क्योंकि उनके आधिकारिक बयानों में पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला देश बताया जाता रहा है। अगस्त 2025 में अल्पसंख्यक दिवस के मौके पर जरदारी ने संविधान के तहत सभी नागरिकों को समान अधिकार देने, धार्मिक भेदभाव के खिलाफ खड़े होने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता जताई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि संवैधानिक बराबरी और सार्वजनिक मंच पर 'हम हिंदुओं को सहते हैं', इन दोनों में से पाकिस्तान की असली सोच कौन-सी है?
दूसरी ओर, जरदारी के बयान पर जावेद अख्तर ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधा हमला किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति कहते हैं कि उनके देश में 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को 'टॉलरैट' किया जाता है। इसके बाद अख्तर ने जरदारी के पुराने चर्चित उपनाम 'Mr Ten Percent' को पकड़ते हुए ऐसा तंज कसा, जिसने पूरे बयान को और ज्यादा राजनीतिक रूप से विस्फोटक बना दिया।
जावेद अख्तर ने कहा कि वह समझ सकते हैं कि जरदारी हमेशा से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील रहे हैं जो '10 प्रतिशत से कम' हैं। यह एक सीधा और बेहद धारदार व्यंग्य था। जरदारी के 'Mr Ten Percent' उपनाम को उनके हिंदुओं के '3-4 प्रतिशत' वाले बयान से जोड़कर अख्तर ने एक ही वार में उनकी संवेदनशीलता और नैतिकता दोनों पर सवाल खड़ा कर दिया।
हम आपको बता दें कि 'Mr Ten Percent' उपनाम जरदारी पर लगे पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा रहा है। 1980 और 1990 के दशक में उन पर सरकारी परियोजनाओं और कारोबारी सौदों में 10 प्रतिशत कमीशन मांगने के आरोप लगाए गए थे। जरदारी ने इन आरोपों से इंकार किया था, लेकिन यह उपनाम लंबे समय तक उनकी राजनीतिक पहचान से जुड़ा रहा। अख्तर ने इसी पुराने संदर्भ को जरदारी के मौजूदा बयान के साथ जोड़कर उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया।
वैसे भी जावेद अख्तर की यह प्रतिक्रिया कोई अचानक पैदा हुआ आक्रोश भी नहीं है। वह लंबे समय से पाकिस्तान की आतंकवाद और भारत विरोधी नीतियों पर खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले वर्ष मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए सांस्कृतिक और दूसरे स्तरों पर प्रयास किए, लेकिन पाकिस्तान की तरफ से रिश्ते सुधारने के लिए ठोस प्रयास नहीं हुए। उन्होंने सीमा पार आतंकवाद और आतंकियों को पनाह देने के मुद्दे पर भी पाकिस्तान को घेरा था।
इसके अलावा, जरदारी के बयान ने एक पुराने सवाल को फिर जिंदा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकार वास्तव में नागरिक अधिकार हैं या बहुसंख्यक समाज की 'मेहरबानी'? अगर हिंदुओं को इसलिए 'स्वतंत्र' बताया जा रहा है क्योंकि बहुसंख्यक उन्हें 'सहन' करते हैं, तो फिर बराबरी का दावा खोखला ही नजर आता है। और यही वह बिंदु है जहां जावेद अख्तर का पलटवार जरदारी के बयान से कहीं आगे निकल जाता है। उन्होंने सिर्फ एक राष्ट्रपति के शब्दों पर आपत्ति नहीं जताई, बल्कि उस सोच पर चोट की जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बहुसंख्यक की सहनशीलता से तौला जाता है।
बहरहाल, जरदारी के लिए यह बयान महज एक भाषण की पंक्ति हो सकती है, लेकिन अख्तर ने उसी पंक्ति को आईना बना दिया। '3-4 प्रतिशत' हिंदुओं को 'सहन' करने का दावा करने वाले पाकिस्तान के राष्ट्रपति को जवाब देते हुए उन्होंने '10 प्रतिशत' वाले तंज से यह संदेश साफ कर दिया कि नागरिक अधिकार किसी बहुसंख्यक की दया नहीं होते।
अन्य न्यूज़














