CJI ने हिंदू आस्था का अपमान किया या उनकी टिप्पणी को संदर्भ से हटा कर पेश किया गया?

By नीरज कुमार दुबे | Sep 18, 2025

भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण समाज में न्यायपालिका को सबसे सम्मानित संस्था माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की हर टिप्पणी न केवल कानूनी दृष्टि से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। मगर हाल ही में प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई द्वारा भगवान विष्णु के संदर्भ में की गई टिप्पणी को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, उसने न्यायपालिका और आस्था के बीच संतुलन की संवेदनशील बहस को जन्म दे दिया है।

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पूरे प्रकरण पर नजर डालें तो सामने आता है कि सुप्रीम कोर्ट ने यूनेस्को की विश्व विरासतों में शुमार मध्य प्रदेश में स्थित खजुराहो मंदिर के परिसर में मौजूद जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की सात फुट ऊंची प्रतिमा को पुन: स्थापित करने के अनुरोध से जुड़ी एक याचिका मंगलवार को खारिज करते हुए कहा कि यह चर्चा में आने के लिए दायर की गई है। प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्र ने राकेश दलाल नामक व्यक्ति की याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया, जिसमें छतरपुर जिले के जावरी मंदिर में क्षतिग्रस्त मूर्ति को बदलने और उसकी प्राण प्रतिष्ठा कराने का अनुरोध किया गया था। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "यह पूरी तरह से प्रचार पाने के लिए दायर याचिका है... जाकर स्वयं भगवान से कुछ करने के लिए कहिए। अगर आप कह रहे हैं कि आप भगवान विष्णु के प्रति गहरी आस्था रखते हैं, तो प्रार्थना करें और थोड़ा ध्यान लगाएं।" याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मूर्ति का सिर जीर्ण-शीर्ण हो चुका है और इसके पुनर्निर्माण की अनुमति देने के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। परन्तु पीठ ने कहा कि यह मुद्दा पूरी तरह से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकार क्षेत्र में आता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "यह (मूर्ति) पुरातात्विक खुदाई में मिली थी, एएसआई ऐसा करने (मूर्ति को ठीक करने) की अनुमति देगा या नहीं... इसको लेकर कई मुद्दे हैं।" प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “इस बीच, अगर आप चाहें तो वहां जाकर पूजा कर सकते हैं... वहां एक बहुत बड़ा शिवलिंग है, जो खजुराहो में सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है।” राकेश दलाल की याचिका में मूर्ति को बदलने या पुनर्निर्माण के लिए निर्देश देने का अनुरोध करते हुए यह भी कहा गया था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय और एएसआई को कई बार ज्ञापन सौंपा जा चुका है।

दूसरी ओर, प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी को लेकर हो रहे विवाद के बाद कुछ राजनीतिक दल भी इसमें कूद पड़े हैं। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से बहस का विषय बना हुआ है। यहाँ एक गंभीर सवाल उठता है— क्या न्यायपालिका की किसी टिप्पणी को हमेशा धार्मिक और राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए? या फिर हमें यह समझना चाहिए कि अदालत में कही गई बातें अक्सर संदर्भ-विशेष में होती हैं और उनका सीधा उद्देश्य धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देना नहीं होता।

देखा जाये तो भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता का पक्षधर है। इसका अर्थ यह है कि राज्य और उसकी संस्थाएँ किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं ले सकतीं, परंतु साथ ही यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे लोगों की आस्था और भावनाओं का सम्मान करें। न्यायपालिका को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि उसका हर शब्द नजीर बन सकता है। प्रधान न्यायाधीश जैसे पद से जुड़ी जिम्मेदारी और भी बड़ी होती है। इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उनके कथन सदैव संतुलित, शालीन और विवाद से परे हों।

इसमें भी कोई दो राय नहीं कि आज के दौर में मीडिया और सोशल मीडिया किसी भी टिप्पणी को तत्काल वायरल कर देते हैं। इससे बात का संदर्भ खो जाता है और केवल विवाद ही उभर कर सामने आता है। यही स्थिति इस प्रसंग में भी देखने को मिल रही है। वास्तविक सवाल यह है कि क्या इस बहस से न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँच रही है और क्या जनता का ध्यान उन मूलभूत मुद्दों से हट रहा है जिन पर न्यायालयों को ध्यान केंद्रित करना चाहिए— जैसे न्याय में देरी, लंबित मामलों का बोझ और न्यायिक सुधार।

देखा जाये तो विवाद के इस दौर में संतुलन की आवश्यकता है। न्यायपालिका को चाहिए कि धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का उल्लेख करते समय अत्यधिक सावधानी बरते। वहीं राजनीतिक दलों को चाहिए कि न्यायिक टिप्पणियों को राजनीति का हथियार न बनाएँ। साथ ही जनता और मीडिया को चाहिए कि संदर्भ को समझें और अनावश्यक उत्तेजना फैलाने से बचें। भारत की शक्ति उसकी विविधता और सहनशीलता में है। यदि न्यायपालिका और समाज इस संतुलन को बनाए रखेंगे तो लोकतंत्र और मजबूत होगा।

बहरहाल, प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी को लेकर उठा विवाद इस बात की याद दिलाता है कि आस्था और कानून के बीच की रेखा कितनी संवेदनशील है। न्यायपालिका से लोगों की उम्मीद केवल न्याय तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह उनकी सांस्कृतिक भावनाओं के सम्मान से भी जुड़ी होती है। इसलिए आगे की राह यही होनी चाहिए कि संस्थाएँ और समाज दोनों परिपक्वता दिखाएँ। भारत के लोकतंत्र की नींव विश्वास और गरिमा पर टिकी है। यह विवाद अगर हमें इस संतुलन को और गहराई से समझने का अवसर देता है, तो इसे सकारात्मक सीख में बदला जा सकता है।

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