सोच-सोच का फर्क (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jun 26, 2021

ताई! परसों ही माँ को पास के अस्पताल में भर्ती करवाया है। कुछ दिनों से बुखार कम नहीं हो रहा था। रह-रहकर उनकी सांसें फूल रही थीं। हमसे रहा नहीं गया। बड़ी घबराहट होने लगी। जैसे-तैसे अस्पताल लेकर पहुँचे। जाँच करवाई तो पता चला कोरोना पॉजिटिव हैं। काफी हाथ-पैर मारने, मंत्री जी तक पहुँच बनाने पर रेमडेसिविर का इंतजाम हो पाया है। जरूरी दवाइयाँ भी नियमित रूप से दी जा रही हैं। इतना कहते-कहते भजनखबरी भावुक हो उठा। उसने माँ को फोन लगाया और ताई को दे दिया। 

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ताई यह सब बातें भजनखबरी की माँ को कहना चाहती थी। किंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। फोन कान पर लगाकर कहने लगीं– तू भी बड़ा कमाल करती है। तुझे हुआ ही क्या है? इस बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है। ये टीवी वाले भी न बेकार में लोगों को डराकर रख देते हैं। सौ में से निन्यानबे लोग यूँ ही ठीक हो जा रहे हैं। एकाध लोग जो ज्यादा चिंता करते हैं या फिर घबरा जाते हैं उन्हीं के साथ कुछ भला-बुरा हो रहा है। तू तो बहादुर है। वैसे भी तेरी कुंडली में सौ साल जीना लिखा है। तू तो हर दिन भगवान की पूजा करती है। भगवान सदा तेरे साथ है। देख दो-चार दिन में तू फिर पहले जैसी चंगी न हो गई तो मैं अपना नाम बदल लूँगी। तू ने बचपन में इससे बड़ी-बड़ी बीमारी देखी है। यह भी भला कोई बीमारी है। इसे तू यूँ मसलकर रख देगी। चल जल्दी से ठीक हो जा और घर आ जा। यहाँ सब तेरी राह ताक रहे हैं।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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