By नीरज कुमार दुबे | Oct 15, 2026
उत्तर प्रदेश की सियासत में एक कहावत खूब चलती है कि यहां राजनीति में उतरना आसान है, लेकिन जनता के दिल और चुनावी मैदान में जगह बनाना उतना ही मुश्किल है। इसी सियासी अखाड़े में अब पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने अपनी नई पार्टी ‘जन नीति भारत’ के साथ ताल ठोक दी है। अपनी पार्टी गठन का ऐलान करते हुए उन्होंने आज 2027 के विधानसभा चुनाव में उतरने की घोषणा की। करीब एक महीने पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति में आने का फैसला करने वाली दिव्या मित्तल ने दावा किया कि उनकी पार्टी सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि जनता की जरूरतों और भागीदारी पर आधारित व्यवस्था खड़ी करेगी। मगर सवाल यही है कि यूपी जैसे जातीय समीकरणों, मजबूत संगठन और संसाधनों वाली राजनीति में उनकी यह नई पहल कितना प्रभाव छोड़ पाएगी?
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हम आपको बता दें कि दिव्या मित्तल की पार्टी ने तीन प्रमुख वादे किए हैं। पहला, नीतियां बनाने में जनता को केंद्र में रखा जाएगा। लोग अपनी जरूरत बताएंगे और विशेषज्ञ उन्हें पूरा करने का तरीका तय करेंगे। दिव्या मित्तल ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि गांव में स्कूल की मांग संबंधी मुद्दा सामने आया, लेकिन बाद में जमीन वन क्षेत्र में होने की बात सामने आई। उन्होंने सवाल उठाया कि गरीबों के लिए स्कूल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की फाइलें वर्षों तक क्यों घूमती रहती हैं, जबकि औद्योगिक परियोजनाओं की मंजूरी में तेजी दिखाई देती है। उनका कहना है कि किसानों की नीतियां किसानों के साथ और छोटे कारोबारियों से जुड़ी नीतियां उनके साथ मिलकर बनाई जानी चाहिए।
उनकी पार्टी का दूसरा वादा है कि सरकारी संसाधनों का बंटवारा पहचान या राजनीतिक फायदे के बजाय वास्तविक जरूरत के आधार पर हो। मित्तल ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए मोबाइल ऐप का प्रस्ताव रखा, जहां महिलाएं असुरक्षित स्थानों की जानकारी दे सकेंगी। किसी जगह से 100 शिकायतें मिलने पर वहां स्ट्रीट लाइट, पुलिस गश्त और सीसीटीवी कैमरों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। उनका तर्क है कि बेटियों की सुरक्षा के इंतजाम किसी घटना के बाद नहीं, बल्कि पहले से होने चाहिए।
तीसरे वादे के तहत सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों की स्थिति बताने वाली रंग-आधारित व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। हरा रंग संतोषजनक काम, पीला अधूरे कार्य और लाल खराब प्रदर्शन का संकेत होगा। इससे जनता और अधिकारियों को कमियां पहचानने तथा सुधार की निगरानी करने में मदद मिलने का दावा है।
दिव्या मित्तल ने जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव के दिन जनता को समझदार माना जाता है, लेकिन बाकी समय उसके फैसलों को महत्व नहीं मिलता। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी के पास स्थापित दलों जैसी आर्थिक ताकत और विज्ञापन का साधन नहीं है। इसलिए घर-घर पहुंचकर समर्थन जुटाने की रणनीति अपनाई जाएगी।
लेकिन यूपी की सियासत में केवल अच्छे विचार और प्रशासनिक अनुभव चुनावी ताकत की गारंटी नहीं हैं। अतीत में कई बड़े नेताओं ने अपनी पार्टियां बनाईं, मगर उन्हें अपेक्षित राजनीतिक विस्तार नहीं मिल सका। कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी, राजबब्बर की राजनीतिक पार्टी बनाने की कोशिशों तथा उनके विभिन्न दलों के साथ हुए प्रयोग और शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) जैसे उदाहरण बताते हैं कि जनाधार, संगठन और चुनावी समीकरणों की अपनी अहमियत है। लेकिन नई पार्टी के सामने संगठन खड़ा करने की चुनौती स्पष्ट रहती है।
अब देखना होगा कि दिव्या मित्तल का ‘जन नीति’ मॉडल जनता की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़कर कितना समर्थन जुटा पाता है। क्या वह गांव-गांव अपनी पहचान बना पाएंगी, या यूपी की सियासत में नई पार्टी का ऐलान एक और प्रयोग बनकर रह जाएगा? 2027 का चुनाव ही बताएगा कि ‘राजनीति नहीं, जन नीति’ का नारा जमीन पर कितना उतरता है।