By अनन्या मिश्रा | Apr 30, 2026
शरीर को सेहतमंद बनाए रखने के लिए फिजिकल और मेंटल दोनों तरह की सेहत पर ध्यान देना जरूरी होता है। हम सभी अक्सर फिजिकल सेहत पर ध्यान देते हैं। लेकिन मेंटल हेल्थ को अनदेखा कर देते हैं। मेडिकल रिपोर्ट्स की मानें, तो सोशल मीडिया पर लोगों से अपनी तुलना, काम के बढ़ते दबाव, असुरक्षा की भावना और अकेलेपन के कारण स्ट्रेस और एंग्जाइटी की समस्या सभी उम्र के लोगों में बढ़ती हुई देखी जा रही है।
यह एक ऐसी समस्या है, जिसकी अक्सर लोगों में पहचान नहीं हो पाती है। इस समस्या से पीड़ित लोगों को नई जगह जाने, लोगों से मिलने में डर लगना या फिर अंजाने लोगों से बात करने में डर लगता है। हालांकि इसको लोग अक्सर शर्मिलापन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कुछ लोगों में यह समस्या इतनी बढ़ जाती है कि इसका असर दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगता है।
विशेषज्ञ सोशल एंग्जाइटी डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य स्थिति मानते हैं, जिसकी पहचान और इलाज करना जरूरी है।
इस डिसऑर्डर की वजह रोगी को लगने लगता है कि लोग उनको जज करेंगे या फिर उनका मजाक उड़ाएंगे।
अगर 6 महीने तक यह डर बना रहे और दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो इसको डिसऑर्डर माना जाता है।
आपको ऐसी स्थितियों से डर लगना, जहां आपका निगेटिव रूप से मूल्यांकन हो सकता है।
अजनबियों से बात करने में डर महसूस होना।
शर्मिंदा या अपमानित महसूस करने की चिंता होना।
यह डर महसूस होना कि दूसरे लोग यह महसूस कर लेंगे कि आप घबराए हुए दिख रहे हैं।
दूसरों से बातचीत करने में पसीना आना, चेहरा लाल होना, कांपना या फिर आवाज का लड़खड़ाना।
उन स्थितियों से बचना, जहां आप पर सबकी नजरें हो सकती हैं।
अगर आपके घर में माता-पिता या भाई-बहन को यह समस्या है। तो आपको भी सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर होने का रिस्क बढ़ जाता है।
जिन बच्चों को तंग किया जाता है, चिढ़ाया जाता है और सामाजिक रूप से नकारा जाता है, उनमें भी इसका रिस्क ज्यादा होता है।
बता दें कि सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर किसी को भी हो सकता है। डॉक्टर जिन लोगों में इस समस्या की पहचान करते हैं, उनको मनोवैज्ञानिक परामर्श या फिर टॉक थेरेपी की सलाह दी जाती है। वहीं कुछ दवाओं के इस्तेमाल से दिमाग के कैमिकल इंबैलेंस और लक्षणों को ठीक करने में भी सहायता मिल सकती है।