पूरी तरह से वापिस मत जाना.....कोरोना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 25, 2020

दुनिया कोरोना को पीटकर, धोकर, हराकर वापिस भेजने के जतन में लगी है। कुदरत का अनंत सहयोग, अनुशासन व स्वानुशासन भरी सतर्क, स्वस्थ, स्वच्छ व सुरक्षित जीवन शैली ही इस विष को लुप्त करेगी। इधर मैं निश्चित रूप से स्वीकारने लगा हूं कि कोरोना के अच्छे असर भी बढ़ते जा रहे हैं। समाज में अच्छा बदलाव लाने वाले विरोधी को भी इज्ज़त से आप पुकारने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती। कोरोना, आपका जब भी लौटने का कार्यक्रम बने, मेरी गुज़ारिश है आप पूरी तरह से वापिस मत जाना। पिछली सदी में पहली बार ऐसा हुआ कि विकासजी के राज्य में प्रकृति का दखल बढ़ता दिख रहा है। 

आप पिछले सौ साल के अत्यधिक सख्त, सफल, कर्मठ, ईमानदार विश्वस्तरीय प्रदूषण बोर्ड की तरह हो जिसने बिना एक भी बैठक किए कुदरत को उन्मुक्त जीवन दिया है। जंगल का तो पता नहीं लेकिन शहर के रास्तों पर मोर नाच रहे हैं और सब देख भी रहे हैं। कुछ बंदे सचमुच ऐसे होंगे जिन्होंने पहली बार हिरण या चिडियां देखी होगी। हालांकि नेता व अफसर पछता रहे होंगे कि यह काम तो उनके कर कमलों द्वारा होना चाहिए था। गृहणियों को शिकायत रहती थी कि पति घर के काम में हाथ नहीं बंटाते अब वे आराम कर रही हैं। जिस भिखारी को रोज़ मांगना पड़ता था उसे एक दिन में दो बार आलू पूरी भी मिल रही है। फेसबुक पढ़ाने वाले दान सेल्फियां दिखाकर अर्जित की गई लाइक्स को पुण्य की कमाई मान रहे हैं। प्रशासक और प्रशासन पूरा जोर लगा रहे हैं कि सबसे अधिक वोट देने वाले तबके का पेट वाकई भरा रहे। स्थानीय नेता सधे हुए नृत्य की तरह समाज सेवा कर रहे हैं। आप इतना खौफनाक असर बनाए रखना कि सब अपने स्वास्थ्य का नियमित ध्यान रखें। सरकारें आम लोगों के लिए उचित स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा उपलब्ध रखें। मजदूरों को रोजाना काम मिल सके। 

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कोरोना, क्या आप धर्म के ठेकेदारों पर दबदबा कायम रख सकते हो, शायद नहीं। जिनकी उम्र बढ़ चली है दुनिया को झेलते झेलते, जिनसे परेशान हैं सेवा करने वाले, जिनकी रोग प्रतिशोधक शक्ति कमज़ोर है, आप उनके लिए कुदरती वरदान साबित हो रहे हो। उम्मीद है आप हमारे असामाजिक कोरोनाओं में भी बदलाव ला सकोगे जिनका सुरक्षा चक्र कोई नहीं तोड़ सकता। यह सब मानते हैं, अगर आप पूरी तरह से चले गए तो यह निश्चित है कि इंसान अपनी स्वार्थी, असामाजिक, अधार्मिक और कुराजनीतिक प्रवृति के कारण जल्दी से जल्दी अपने पुराने ढर्रे पर लौटना चाहेगा और लौटकर ही मानेगा। आप यहां रहोगे तो वह डर कर रहेगा और संभवत ऐसा नहीं करेगा। आपके कारण वह फिर से समझ रहा है कि उसके बहुमूल्य जीवन की ज़रूरतें वास्तव में कितनी हैं। ‘थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है, ज़िंदगी यहां खूबसूरत है’ उसका प्रिय गीत है अब।

- संतोष उत्सुक

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